Wednesday, September 28, 2022
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भारत बना रहा इलेक्ट्रिक हाईवे,दौड़ती गाड़ियां हो जाएंगी चार्ज

Updated on 14/September/2022 5:25:33 PM

नई दिल्ली। भारत ऐसे हाईवेज बना रहा है, जिस पर चलते हुए ही गाड़ियां चार्ज हो जाएंगी। इसकी तस्दीक ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर नितिन गडकरी ने भी की है। उन्होंने कहा कि सरकार सोलर एनर्जी से चलने वाले इलेक्ट्रिक हाईवेज बनाने पर काम कर रही है। इन हाईवेज पर चलते हुए भारी-भरकम ट्रक और बसें चार्ज हो सकेंगे।

सवाल 1: क्या होते हैं इलेक्ट्रिक हाईवे?
जवाब: आम हाईवे या एक्सप्रेसवे पक्की सड़कों से बने होते हैं, जिन पर हर तरह की गाड़ियां दौड़ सकती हैं।

वहीं इलेक्ट्रिक हाईवे ऐसे हाईवे होते हैं, जिनमें कुछ इक्विपमेंट्स के जरिए ऐसा सिस्टम होता है, जिससे उनसे गुजरने वाली गाड़ियां बिना रुके ही अपनी बैटरी चार्ज कर सकती हैं। इसके लिए हाईवे पर ओवरहेड वायर या रोड के नीचे से ही इलेक्ट्रिक फ्लो करने का सिस्टम बना होता है।

इलेक्ट्रिक हाईवे से केवल इलेक्ट्रिक गाड़ियां ही चार्ज हो सकती हैं। इससे पेट्रोल-डीजल वाली गाड़ियां नहीं चार्ज होती। इनसे हाइब्रिड गाड़ियां भी चार्ज हो सकती हैं। हाइब्रिड गाड़ियों में इलेक्ट्रिक के साथ-साथ पेट्रोल-डीजल से चलने की भी सुविधा होती है।

यानी इलेक्ट्रिक हाईवे इलेक्ट्रिक सुविधा से लैस ऐसे हाइवे होते हैं, जहां उनके ऊपर से गुजरती गाड़ियों को चार्ज किया जा सकता है।

सवाल 2: इलेक्ट्रिक रोड पर चलते हुए कैसे चार्ज हो जाती हैं गाड़ियां?
जवाब: इलेक्ट्रिक हाईवेज पर गाड़ियों की चार्जिंग के लिए दो तरीकों का इस्तेमाल होता है-

  1. ओवरहेड पावर लाइन यानी रोड के ऊपर लगे इलेक्ट्रिक वायर का इस्तेमाल करके।
  2. रोड के अंदर ही पावर लाइन बिछाकर यानी ग्राउंड लेवल पावर सप्लाई के जरिए।
  3. ओवरहेड पावर लाइन: इसमें रोड के ऊपर इलेक्ट्रिक वायर लगे होते हैं। जब इन वायर के नीचे से हाइब्रिड या इलेक्ट्रिक गाड़ियां गुजरती हैं, तो गाड़ियों के ऊपर लगे पैंटोग्राफ इन वायर के संपर्क में आ जाते हैं। इससे करेंट का फ्लो वायर से उस गाड़ी में होने लगता है और उसकी बैटरी चार्ज हो जाती है। जब तक गाड़ी इन तारों के संपर्क में रहती हैं, तब तक उनकी बैटरी चार्ज होती रहती हैं।

किसी दूसरी तरफ मुड़ने यानी वायर से संपर्क टूटने के बाद गाड़ी वापस से डीजल या पेट्रोल इंजन मोड में आ जाती है। यानी इलेक्ट्रिक बैटरी की जगह पेट्रोल-डीजल से चलने लगती है।

इन हाईवेज से चार्ज इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड गाड़ियां ही होती हैं। हाइब्रिड यानी इलेक्ट्रिक और डीजल-पेट्रोल दोनों से चलने वाली गाड़ियां।

इलेक्ट्रिक हाईवे पर इस टेक्नीक से भारी-भरकम ट्रकों या बसों को ही चार्ज किया जा सकता है।

इलेक्ट्रिक हाईवेज को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि इसमें गाड़ियों के बीच टक्कर होने या बिजली का झटका लगने का डर नहीं रहता है।

  1. ग्राउंड लेवल पावर सप्लाई: इसमें रोड में इलेक्ट्रिक कनेक्शन रोड के अंदर ही फिट किया जाता है। इसमें रोड के नीचे ऐसे रेल या कॉइल लगाए जाते हैं, जिनके जरिए इलेक्ट्रिक का फ्लो हो सकता है। इस टेक्नीक से भी दो तरह से चार्जिंग होती है।

(i) इलेक्ट्रिक रेल: जब इलेक्ट्रिक रोड के ऊपर से गाड़ियां गुजरती हैं, तो गाड़ियों में लगे खास तरह के कॉइल इन रोड में लगे इलेक्ट्रिक रेल या कॉइल के संपर्क में आते हैं, तो उनकी बैटरी चार्ज होने लगती हैं।

Fleetevolution.com के अनुसार-‘रोड के नीचे लगाए गए इलेक्ट्रिक केबल और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ट्रांसमीटर्स से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड पैदा होता है। इस एनर्जी को उस रोड से गुजरती गाड़ी के अंदर लगा एक खास कॉइल खींचता है, इस एनर्जी का इस्तेमाल बैटरी को चार्ज करने के लिए किया जाता है, जो कार की रेंज को बढ़ा देते हैं।’

(ii) वायरलेस चार्जिंग: ये भी ग्राउंड लेवल पावर सप्लाई टेक्नीक,यानी रोड से चार्जिंग। बस इसमें गाड़ियों को चार्ज करने में वायरलेस चार्जिंग यानी इंडक्टिव चार्जिंग का इस्तेमाल होता है। इस तरह की टेक्नीक में गाड़ियां चार्जिंग के लिए कॉइल की जगह सेंसर के जरिए ही रोड पर लगे चार्जिंग पॉइंट के संपर्क में आने पर चार्ज हो जाती हैं। इसका एक उदाहरण मोबाइल फोन की वायरलेस चार्जिंग है।

ग्राउंड लेवल पावर सप्लाई टेक्नीक से न केवल ट्रक और बस बल्कि कार समेत कोई भी गाड़ी चार्ज हो सकती है। खास बात ये है कि ग्राउंड लेवल पावर की टेक्नीक ओवर हेड पावर टेक्नीक से सस्ती होती है।

सवाल 3: दुनिया में सबसे पहले कहां हुआ इलेक्ट्रिक हाईवेज का इस्तेमाल?
जवाब: 1990 से 2010 के बीच कई कंपनियों ने इलेक्ट्रिक रोड बनाने के प्रोजेक्ट्स पर काम किया।

सबसे पहले साउथ कोरिया ने 2013 में अपने शहर गूमी में बसों के लिए 7.5 किलोमीटर लंबा इलेक्ट्रिक रूट बनाया था। बसें इस रोड पर चलते हुए उस पर लगे वायरलेस चार्जिंग इक्विपमेंट्स से चार्ज हो जाती थीं।

2015 में साउथ कोरिया ने सेजोंग शहर में बसों के लिए दूसरा इलेक्ट्रिक रूट बनाया था। 2016 में कोरिया ने गूमी में बसों के लिए दो और इलेक्ट्रिक रूट लॉन्च किए थे।

स्वीडन ने 2018 में स्टॉकहोम में दुनिया की पहली इलेक्ट्रिफाइड रोड शुरू की थी, जिस पर चलते हुए कार, बस और ट्रकों की बैटरियां चार्ज हो सकती हैं।

2019 में जर्मनी ने फ्रैंकफर्ट शहर के पास दुनिया का पहला इलेक्ट्रिक हाईवे शुरू किया था, जिस पर चलते हुए हाइब्रिड ट्रक रिचार्ज हो सकते हैं। करीब 10 किलोमीटर लंबी इस इलेक्ट्रिक रोड को सीमेंस मोबिलिटी कंपनी ने बनाया है।

अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और फ्रांस भी इलेक्ट्रिक हाईवे और इलेक्ट्रिक रोड बनाने पर काम कर रहे हैं।

भारत में पिछले कई सालों से इलेक्ट्रिक हाईवे प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। 2023 में देश का पहला इलेक्ट्रिक हाईवे शुरू होने की उम्मीद है।

सवाल 4: भारत में कब से और कहां शुरू होगा इलेक्ट्रिक हाईवे?
जवाब: भारत में इलेक्ट्रिक हाइवे बनाने की योजना 2016 में ही शुरू हो गई थी। तब ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर नितिन गडकरी ने कहा था कि जल्द ही भारत में भी स्वीडन की तरह इलेक्ट्रिक हाईवे होंगे।

भारत ने दुनिया के सबसे लंबे इलेक्ट्रिक हाईवे के निर्माण के लिए अटल हरित विद्युत राष्ट्रीय महामार्ग यानी AHVRM नामक योजना शुरू की है। इसके तहत सबसे पहले दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेसवे और दिल्ली-आगरा यमुना एक्सप्रेसवे को इलेक्ट्रिक हाईवे बनाने का प्रोजेक्ट चल रहा है।

यमुना एक्सप्रेसवे पर इलेक्ट्रिक हाईवे का ट्रायल दिसंबर 2020 में हो चुका है। वहीं दिल्ली-जयपुर हाईवे को इलेक्ट्रिक हाइवे बनाने के लिए ट्रायल 9 सितंबर 2022 को शुरू हो चुका है, जो एक महीने तक चलेगा।

दिल्ली-जयपुर हाईवे और दिल्ली-आगरा यमुना एक्सप्रेसवे को मिलाकर करीब 500 किलोमीटर इलेक्ट्रिक हाईवे के मार्च 2023 तक शुरू हो जाने की उम्मीद है। ये देश का पहला और दुनिया का सबसे लंबा इलेक्ट्रिक हाईवे होगा। अभी दुनिया में सबसे लंबा इलेक्ट्रिक हाईवे बर्लिन में है, जिसकी लंबाई 109 किलोमीटर है।

पिछले साल लोकसभा में गडकरी ने बताया था कि सरकार की योजना 1300 किलोमीटर लंबे दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर इलेक्ट्रिक हाईवे बनाने की है। ये एक्सप्रेसवे मार्च 2023 तक पूरा होने की उम्मीद है। इस एक्सप्रेस-वे पर इलेक्ट्रिक हाईवे की एक अलग से लेन बनाने की योजना है।

सवाल 5: इलेक्ट्रिक हाईवे बनाने के फायदे क्या हैं?
जवाब: इलेक्ट्रिक हाईवे को दो कारणों से भविष्य बदलने वाली सोच के तौर पर देखा जा रहा है। पहला-इससे फॉसिल्स फ्री यानी पेट्रोल-डीजल के बिना गाड़ियां चल पाएंगी। दूसरा- इससे वायु प्रदूषण जीरो हो जाता है। प्रदूषण पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर समस्या है।

सीमेंस कंपनी के मुताबिक- ‘अगर ट्रकों के ट्रैफिक वाले हाईवेज में से करीब 30% इलेक्ट्रिक कर दिए जाएं तो इससे हर साल करीब 70 लाख टन कम कार्बन डाइऑक्साइड रिलीज होगी। यानी वायु प्रदूषण की समस्या में बहुत कमी आएगी।”

ट्रांसपोर्ट मिनिस्ट्री के मुताबिक, इलेक्ट्रिक हाईवेज के बनने से हर साल करीब 32 लाख करोड़ लीटर पेट्रोल-डीजल की बचत होगी। साथ ही इससे हर साल देश के लॉजिस्टिक लागत में करीब 1 लाख करोड़ रुपए की कमी आएगी।

ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर नितिन गडकरी का कहना है कि सरकार इलेक्ट्रिक हाईवेज बनाने पर 2.5 लाख करोड़ रुपए खर्च कर रही है। सरकार का मानना है कि इससे देश में इलेक्ट्रिक गाड़ियों का बाजार तेजी से बढ़ेगा।

इलेक्ट्रिक हाईवेज सरकार की देश में 26 ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे निर्माण की योजना का हिस्सा हैं। गडकरी का कहना है कि सरकार की योजना ग्रीनफील्ड एक्सप्रेसवे के तहत देश भर के हाईवे के किनारे करीब 3 करोड़ पेड़ लगाने की है।

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