सावधान ! बच्चों को अपना शिकार बना रहा अस्थमा,जानें बचाव का सही तरीका

सावधान ! बच्चों को अपना शिकार बना रहा अस्थमा,जानें बचाव का सही तरीका

नई दिल्ली। एयरवेज में सूजन आने से वह सिकुड़ जाती है और अस्थमा की समस्या होती है। बच्चों में अस्थमा काफी संवेदनशील होता है। एक आंकड़े के मुताबिक,पहले 6 साल में करीब 80 प्रतिशत बच्चों में अस्थमा के लक्षण पाए जाते हैं। इससे उनके डेली एक्टिविटीज प्रभावित होती हैं और उन्हें बार-बार डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। इसका असर उनकी बॉडी पर पड़ता है। बाल रोग विशेषज्ञ के मुताबिक,अगर बच्चों के अस्थमा का सही समय पर इलाज न किया जाए तो उसके बढ़ने का खतरा रहता है। यह उनके उम्र बढ़ने के साथ और ज्यादा बिगड़ सकता है। बच्चों में अस्थमा आनुवांशिक भी हो सकता है। मौसम में बदलाव,वायु प्रदूषण जैसे कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

rajeshswari

बच्चों में अस्थमा के लक्षण
सांसों का छोटा होना
छाती में भारीपन और कड़ापन होना
सर्दी या फ्लू में खांसी या छींक आना
श्वसन-तंत्र में इंफेक्शन के बाद उसे ठीक होने में देरी होना
थकान होना

बच्चों में अस्थमा का पता कैसे लगाएं
बच्चे अस्थमा से परेशान न हो और उनका सही इलाज हो पाए,इसलिए पैरेंट्स को अपने बच्चे पर ध्यान देना चाहिए। उनके लक्षणों को गंभीरता से समझना चाहिए। अगर बच्चे 5 साल से बड़े हैं तो लंग फंक्शन टेस्ट से उनमें अस्थमा की जांच की जाती है। इसके अलावा पीक एक्सपाइरेटरी फ्लो और स्पाइरोमेट्री टेस्ट से भी इसका पता लगाया जा सकता है। ज्यादातर स्कूल बच्चों के लिए फेनो टेस्टिंग की जाती है।

अस्थमा का इलाज
उम्र के साथ अस्थमा का इलाज भी बदल जाता है। इनहैलेशन थेरैपी सबसे बेहतर इलाज माना जाता है। बच्चों और बड़ों में अस्थमा जल्दी ठीक नहीं हो पाता है। हालांकि,अगर सही समय पर इसका पता लग जाए तो इसे कंट्रोल जरूर किया जा सकता है। पैरेंट्स इसके लिए डॉक्टर की सलाह ले सकते हैं। डॉक्टर की बताई चीजों के हिसाब से बच्चों का ख्याल रखना चाहिए। अस्थमा के अटैक का समय, अवधि और परिस्थितियां,लक्षणों या गतिविधि में बदलाव,दवाईयों के दुष्प्रभाव और इलाज की पूरी प्रक्रिया पर नजर रखें। इससे काफी हेल्प मिलती है।

इसे भी पढ़े   दलाल स्‍ट्रीट को RBI का बूस्‍टर! नई ऊंचाई पर बाजार,सेंसेक्‍स 1619 अंक उछला,निफ्टी 2% चढ़ा

बच्चों में अस्थमा कंट्रोल करने के उपाय

  1. जो कारण पहचान में आए, उनसे संपर्क कम करें।
  2. बच्चों को तंबाकू से दूर रखें. आप भी उनके सामने इसका इस्तेमाल न करें।
  3. बच्चों को फिजिकल एक्टिविटी के लिए प्रोत्साहित करें। इससे वह मजबूत होता है और उसके फेपड़े की क्षमता ज्यादा बढ़ती है।
  4. दवाइयों और इलाज को सही तरह व्यवस्थित रखने के लिए नियमित तौर पर चेक-अप करवाएं।
  5. हार्टबर्न और एसिड रिफ्लक्स को कंट्रोल करें।
Shiv murti

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *