लिख दो मेरे रोम रोम में राम | प्रभु श्रीराम के नाम से भरे जीवन का आह्वान

लिख दो मेरे रोम रोम में राम | प्रभु श्रीराम के नाम से भरे जीवन का आह्वान

“लिख दो मेरे रोम रोम में राम” भक्ति का वह गूढ़ भाव है जिसमें भक्त अपने समर्पण की पराकाष्ठा को प्रकट करता है। यह केवल ईश्वर से कृपा की याचना नहीं, बल्कि इस भावना का प्रतीक है कि हर श्वास, हर कण में केवल श्रीराम का नाम बस जाए। जब भक्त यह प्रार्थना करता है, तो वह स्वयं को पूर्णतः प्रभु को समर्पित कर देता है। यह भाव हमें सिखाता है कि सच्चा आनंद तब ही मिलता है जब हम अपने अहंकार को छोड़कर ईश्वर के नाम में विलीन हो जाते हैं।

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लिख दो मेरे रोम रोम में राम,
राम राम और रमा पति…..

शीश पे मेरे शिवजी लिख दो,
कानो पे कन्हैया जी
नैनो में नरसिंह लिख दो,
नाक पे नाग नथेया जी,
लिख दो मेरे रोम रोम में राम,
राम राम और रमा पति…..

होंठों पे हरी जी लिख दो,
दांतो पे दयालु राम जी,
और जीभ पे जगदीश लिख दो,
कंठ पे कमलापति राम जी,
लिख दो मेरे रोम रोम में राम,
राम राम और रमा पति…..

गला में मेरे गिरधारी लिख दो,
मुख पर मुरली वाले श्याम जी,
भुजा पे भगवान लिख दो,
हाथो पे मेरे हनुमाना जी,
लिख दो मेरे रोम रोम में राम,
राम राम और रमा पति…..

छाती पे मेरे चतुर्भुज लिख दो,
पेट पे परमेश्वर राम जी,
नाभी पे नारायण लिख दो,
जांघो पे जय सियाराम जी,
लिख दो मेरे रोम रोम में राम,
राम राम और रमा पति…..

घुटने पे गोविंदा लिख दो,
पीठ पे परमानन्द राम जी,
चोटी पे आशा गिरी लिख दो,
चरणों में लिख दो चारो धाम जी,
लिख दो मेरे रोम रोम में राम,
राम राम और रमा पति…..

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विधि भक्ति भाव से जप या गान करने का तरीका

  1. समय और स्थान: भोर या संध्या का समय चुनें, स्वच्छ स्थान पर बैठें।
  2. पूजा की तैयारी: श्रीराम, सीता माता और हनुमान जी के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक और धूप जलाएँ।
  3. मन की स्थिरता: तीन गहरी सांसें लेकर मन को शांत करें और प्रभु के नाम का स्मरण करें।
  4. भावपूर्वक उच्चारण: धीमे और भावना से कहें — “लिख दो मेरे रोम रोम में राम”।
    • इसे 11, 21 या 108 बार जप सकते हैं।
    • हर बार यह अनुभव करें कि आपके शरीर, मन और आत्मा में राम नाम बस रहा है।
  5. समापन: अंत में नम्रता से प्रार्थना करें कि प्रभु का नाम सदैव आपके साथ बना रहे।

लाभ इस भाव से मिलने वाले दिव्य परिणाम

  • मन और आत्मा में अद्भुत शांति और पवित्रता का अनुभव होता है।
  • जीवन में भय, चिंता और असुरक्षा की भावना मिटती है।
  • हर कार्य में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है।
  • भक्ति के माध्यम से सकारात्मक ऊर्जा और स्थिरता बढ़ती है।
  • “राम नाम” हृदय में अंकित होकर जीवन को अर्थपूर्ण और मधुर बनाता है।

निष्कर्ष

“लिख दो मेरे रोम रोम में राम” केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली हुई पुकार है। जब हम ईश्वर से यह निवेदन करते हैं कि उनका नाम हमारे हर कण में बस जाए, तो यह भक्ति हमें पूर्ण रूप से दिव्यता से जोड़ देती है। यह भाव सिखाता है कि सच्ची पूजा वह नहीं जो बाहर हो, बल्कि वह है जो भीतर घटे। जब हर रोम में “राम” बस जाए, तब जीवन स्वयं एक मंदिर बन जाता है और हृदय स्वयं एक आरती। 🌺

Shiv murti

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