दुनिया में देव हजारों हैं | सच्ची आस्था और एकनिष्ठ भक्ति का संदेश
“दुनिया में देव हजारों हैं” — यह पंक्ति उस सत्य का बोध कराती है कि ईश्वर अनेक रूपों में इस सृष्टि में विद्यमान हैं। हर रूप, हर नाम, हर मंदिर में वही एक शक्ति बसती है, जिसे हम अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। यह भाव हमें सिखाता है कि भक्ति का सार रूप में नहीं, भाव में छिपा होता है। जब भक्त एक ही ईश्वर में सबका दर्शन करता है, तब उसका मन संकीर्णता से मुक्त होकर सच्चे प्रेम और एकता का प्रतीक बन जाता है।

दुनिया मे देव हजारो हैं, बजरंग बली का क्या कहना,
इनकी शक्ति का क्या कहना, इनकी भक्ति का क्या कहना,
दुनिया मे देव हजारो हैं, बजरंग बली का क्या कहना……..
ये सात समुन्दर लांग गए और गढ़ लंका मे कूद गए,
रावन को डराना क्या कहना, लंका को जलाना क्या कहना,
दुनिया मे देव हजारो हैं बजरंग बली का क्या कहना…….
जब लक्ष्मन जी बेहोश हुए, संजीवनी बूटी लाने गए,
परबत को उठाना क्या कहना, लक्ष्मन को जिवाना क्या कहना,
दुनिया मे देव हजारो हैं बजरंग बली का क्या कहना…
‘बनवारी’ इनके सीने मे सिया राम की जोड़ी रहती है,
ये राम दिवाना क्या कहना, गुण गाये जमाना क्या कहना,
दुनिया मे देव हजारो हैं बजरंग बली का क्या कहना……
विधि
- स्थान की पवित्रता: घर या मंदिर में श्रद्धा से दीपक जलाएँ।
- प्रारंभ: अपने आराध्य देव का नाम लेकर प्रणाम करें।
- स्मरण: “दुनिया में देव हजारों हैं, पर तू ही मेरा सहारा है” पंक्ति का स्मरण करें या गुनगुनाएँ।
- भावना: सभी देवताओं के रूप में एक ही परमात्मा का दर्शन करें।
- सेवा और करुणा: सभी प्राणियों में ईश्वर का अंश मानकर प्रेम और सेवा का भाव रखें।
- समापन: अंत में हाथ जोड़कर प्रार्थना करें — “हे प्रभु, मुझे ऐसी दृष्टि दो जो हर रूप में तुम्हें देख सके।”
लाभ
- मन में एकता और शांति: सभी धर्मों और देवताओं के प्रति समान भाव विकसित होता है।
- ईर्ष्या और भेदभाव का अंत: हृदय में प्रेम और करुणा का भाव बढ़ता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: भक्ति का दायरा विस्तृत होकर ईश्वर के सच्चे रूप तक पहुँचता है।
- सकारात्मक सोच: जीवन में संतुलन और स्थिरता आती है।
- प्रेममय जीवन: दूसरों के प्रति आदर और सहयोग का भाव जन्म लेता है।
निष्कर्ष
“दुनिया में देव हजारों हैं” — यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि ईश्वर एक है, बस उसके रूप अनेक हैं। जो भक्त हर रूप में उसी एक परमात्मा का दर्शन करता है, वही सच्चा साधक कहलाता है। यह भाव हमें विभाजन नहीं, बल्कि समरसता और प्रेम की ओर ले जाता है।

