आजा लाज बचाने | भक्त की पुकार और भगवान की करुणा का अद्भुत संगम
आजा लाज बचाने यह वाक्य भक्ति का वह गूंजता हुआ स्वर है जिसमें भक्त अपने आराध्य से पूर्ण विश्वास के साथ सहायता की याचना करता है। जब जीवन में संकट आते हैं और कोई सहारा नहीं दिखता, तब भक्त ईश्वर से यही कहता है ,हे प्रभु, अब आप ही मेरी लाज रखो। यह भाव केवल सहायता का नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक है। इतिहास साक्षी है कि जिसने सच्चे मन से पुकारा, प्रभु सदैव उसकी रक्षा के लिए आए हैं चाहे वह द्रौपदी की पुकार हो या किसी भक्त का निवेदन।

हम तो आये, तेरे द्वारे, दुख-दर्दो के मारे,
आजा अब तो, लाज बचाने, ओ हारे के सहारे,
पैदल चलकर, रिंगस से मैं, तेरा निशान उठाऊं,
चढ़कर तेरह पेड़ी बाबा, तेरा दर्शन पाऊं,
लेने आजा, तोरण द्वार पे, तेरा यें दास पुकारे,
आजा अब तो लाज बचाने….
मैं श्याम कुंड में, नहा के बाबा, तेरे दर पे आऊं,
केसर- इत्र- गुलाब ले के, तुझको भेंट चढ़ाऊं,
भोग लगाऊं, तुझको बाबा, छप्पन भोग तू खा ले,
आजा अब तो लाज बचाने….
हारे का तू, साथी कहाए, बाबा लखदातारी,
एक बांण से, खेल दिखाये, जाने दुनियाँ सारी,
तीनो लोक में, डंका बजता, ऐसे श्याम हमारे,
आजा अब तो लाज बचाने….
तू झोली सबकी, भरता बाबा, दर जो तेरे आये,
इच्छा सबकी, पूरी होती, ध्यान जो तेरा लगाएं,
मोहित गोयल के, तूने बाबा, बिगड़े काम सवारें,
आजा अब तो लाज बचाने….
भाव से प्रार्थना या पूजन विधि
- दिन: मंगलवार, गुरुवार या संकट के समय किसी भी दिन श्रद्धा से पूजा की जा सकती है।
- स्थान: घर के मंदिर या भगवान के चित्र के समक्ष दीपक जलाएँ।
- सामग्री: फूल, धूप, दीपक, तुलसी पत्र, जल और प्रसाद रखें।
- प्रारंभ: मन में भगवान का नाम लेकर “ॐ नमः भगवते वासुदेवाय” या अपने इष्ट देव का मंत्र जपें।
- भाव: भगवान के सामने बैठकर अपनी स्थिति बताएं और कहें — “हे प्रभु, आप ही मेरी लाज बचाने आइए।”
- समापन: शांति मंत्र या आरती के साथ प्रार्थना करें — “हे ईश्वर, हमारे जीवन में सदैव आपकी कृपा बनी रहे।”
इस भक्ति से मिलने वाले लाभ
- मन को साहस और आत्मविश्वास मिलता है।
- संकटों में ईश्वर की कृपा से रक्षा होती है।
- भक्ति में गहराई और विश्वास बढ़ता है।
- आत्मिक शांति और सुकून का अनुभव होता है।
- जीवन में सकारात्मकता और दिव्यता का संचार होता है।
निष्कर्ष
आजा लाज बचाने केवल एक पुकार नहीं, बल्कि भक्ति का गूढ़ संदेश है कि जब संसार का कोई उपाय काम न आए, तब ईश्वर की शरण में जाने से ही मुक्ति मिलती है। प्रभु अपने भक्तों की लाज हमेशा रखते हैं, चाहे समय कितना भी कठिन क्यों न हो। यह भाव हमें सिखाता है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास से किया गया स्मरण कभी व्यर्थ नहीं जाता। ईश्वर सदैव अपने भक्तों के साथ हैं, बस हमें अपने मन को उनके चरणों में समर्पित करना है।

