यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे | माँ और बालक के प्रेम की अद्भुत लीलाएँ

“यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे” — यह पंक्ति उस स्नेहभरे क्षण को जीवंत करती है जब माँ यशोदा अपने नटखट कान्हा को ढूँढती फिरती हैं। कृष्ण की बाललीलाएँ केवल शरारत नहीं, बल्कि प्रेम और आनंद की मूर्तियाँ हैं। यह भाव माँ के असीम प्रेम, चिंता और वात्सल्य को दर्शाता है, जिसमें हर माता अपने बच्चे का रूप देख सकती है। इस पंक्ति में भक्ति के साथ-साथ मातृत्व की कोमलता झलकती है — जहाँ प्रेम और ईश्वर एक ही भाव में मिल जाते हैं।

rajeshswari

सारी, मटकी का माखन, बिखेर गयो रे ll
यशोदा, तेरा लाला, किधर गयो रे ll

घाटों में, ढूंढ आई, पनघट पे, खोज़ आई ll
गोपियों के, बीच से, निकल गयो रे l
यशोदा, तेरा लाला, किधर गयो रे ll
सारी, मटकी का माखन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बागों में, ढूंढ आई, माली से, पूछ आई ll
कलियों के, बीच से, निकल गयो रे l
यशोदा, तेरा लाला, किधर गयो रे ll
सारी, मटकी का माखन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

सखियों से, पूछ आई, दाऊ से, पूछ आई ll
गलियों के, बीच से, निकल गयो रे l
यशोदा, तेरा लाला, किधर गयो रे ll
सारी, मटकी का माखन,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

वृन्दावन में, खोज़ आई, घर घर में, बोल आई ll
ब्रज की, लताओं में, छुप गयो रे l
यशोदा, तेरा लाला, किधर गयो रे ll
सारी, मटकी का माखन*,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

भाव से पूजन विधि

  1. दिन और समय: सोमवार या शुक्रवार का दिन विशेष शुभ होता है।
  2. स्थान: श्रीकृष्ण के बालरूप (लड्डूगोपाल) की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
  3. सामग्री: तुलसीदल, पीले फूल, मक्खन, मिश्री, और दूध अर्पित करें।
  4. प्रारंभ: “जय कन्हैया लाल की” बोलकर मन को शांत करें।
  5. भजन या जप: भावपूर्वक “यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे” भजन गाएँ या मन ही मन दोहराएँ।
  6. भावना रखें: अपने मन में यह कल्पना करें कि आप भी वृंदावन की गलियों में हैं और छोटे कान्हा की झलक पा रहे हैं।
  7. समापन: अंत में श्रीकृष्ण से प्रार्थना करें — “हे नंदलाल, मेरे जीवन में भी वही मासूमियत और प्रेम की मिठास भर दो।”
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इस भक्ति से मिलने वाले लाभ

  • हृदय में प्रेम और कोमलता: माँ यशोदा और कृष्ण के संबंध से हृदय में स्नेह बढ़ता है।
  • मन की शांति: बालकृष्ण के नाम का स्मरण मन को शांति देता है।
  • भक्ति में गहराई: यह भक्ति आत्मीयता और सच्चे प्रेम को बढ़ाती है।
  • घर में सुख-समृद्धि: बालकृष्ण की कृपा से घर में आनंद और सौभाग्य का वास होता है।
  • भावनात्मक संतुलन: माँ के वात्सल्य भाव से मन में करुणा और संतोष आता है।

निष्कर्ष

“यशोदा तेरा लाला किधर गयो रे” — यह केवल एक पुकार नहीं, बल्कि प्रेम की मधुर गूँज है। इसमें एक माँ की ममता और भगवान की लीलाओं का ऐसा संगम है जो हर हृदय को भक्ति से भर देता है। जब हम इस भाव से श्रीकृष्ण का स्मरण करते हैं, तो जीवन के सारे क्लेश मिट जाते हैं और मन में बालसुलभ आनंद जाग उठता है। वास्तव में, यशोदा का लाला केवल वृंदावन में नहीं — हर उस हृदय में है, जहाँ सच्चा प्रेम और भक्ति का भाव बसता है।

Shiv murti

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