मणिकर्णिका घाट : विकास के नाम पर विरासत पर सवाल, कांग्रेस ने किया जोरदार प्रदर्शन
वाराणसी (जनवार्ता) । काशी के पवित्र महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्विकास और सुंदरीकरण कार्य के दौरान महारानी देवी अहिल्याबाई होल्कर की प्राचीन प्रतिमा क्षतिग्रस्त होने की घटना ने धार्मिक भावनाओं को गहरी चोट पहुंचाई है और राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है।

इस मामले में नगर निगम द्वारा संचालित 25 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट के तहत करीब 10 जनवरी के आसपास बुलडोजर चलाए गए। महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा सन् 1771 में पुनर्निर्मित इस घाट के हिस्से में प्राचीन चबूतरा (मणि) और आसपास की संरचनाओं के साथ प्रतिमाएं भी प्रभावित हुईं। इस दौरान हुई क्षति के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के कारण लोगों में भारी आक्रोश फैल गया।
घटना के विरोध में शुक्रवार को कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जिला मुख्यालय पर जोरदार प्रदर्शन किया और जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा। महानगर कांग्रेस अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे ने कहा कि विकास के नाम पर काशी की आस्था, इतिहास और संस्कृति का सुनियोजित विनाश किया जा रहा है। उन्होंने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि पहले सैकड़ों मंदिर तोड़े गए और अब मणिकर्णिका घाट पर भी मूर्तियों और धार्मिक प्रतीकों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है।
वाराणसी के जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रतिमा को जानबूझकर नहीं तोड़ा गया है। क्षतिग्रस्त कलाकृतियां और संरचनाएं संस्कृति विभाग को सौंप दी गई हैं और पुनर्निर्माण कार्य पूरा होने के बाद इन्हें विधि-विधान के अनुसार उसी स्थान पर पुनः स्थापित किया जाएगा। प्रशासन का कहना है कि यह कार्य घाट पर स्वच्छता, बेहतर प्रबंधन और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया जा रहा है।
इस बीच होल्कर परिवार के वंशजों, इंदौर स्थित ट्रस्ट, पाल समाज, धनगर समाज और अन्य संगठनों ने भी विरोध जताया है। कुछ स्थानों पर शुद्धि पूजन करवाया गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि इतिहास को मिटाकर अपना नाम प्लेट लगाने की कोशिश की जा रही है। यह मुद्दा अब राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बन चुका है, जहां एक तरफ विकास की आवश्यकता और दूसरी तरफ सनातन विरासत की रक्षा का सवाल खड़ा हो गया है।
यह मामला अत्यंत संवेदनशील है और इसमें भावनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक महत्व भी जुड़ा हुआ है। सभी पक्षों की उम्मीद है कि निष्पक्ष जांच के बाद इस विवाद का ऐसा समाधान निकलेगा जो काशी की आत्मा को बचाए रखते हुए आधुनिक सुविधाओं को भी सुनिश्चित कर सके।

