रथ पर सवार होकर संगम स्नान शास्त्र-विरुद्ध
अविमुक्तेश्वरानंद पर जगद्गुरु रामभद्राचार्य की दो टूक टिप्पणी
प्रयागराज ( जनवार्ता)। माघ मेला के दौरान मौनी अमावस्या (17 जनवरी) को संगम तट पर हुए विवाद ने संत समाज में गहरी बहस छेड़ दी है। ज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को रथ/पालकी पर सवार होकर संगम स्नान करने से मेला प्रशासन द्वारा रोके जाने के बाद तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।

तुलसीपीठाधीश्वर पद्म विभूषण जगद्गुरु रामभद्राचार्य महाराज ने इस मुद्दे पर स्पष्ट और कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के आचरण को शास्त्र-विरुद्ध बताते हुए कहा, “रथ या पालकी में चढ़कर संगम स्नान करने जाना बिल्कुल नहीं जाना चाहिए था। यह शास्त्रों के विरुद्ध है। जो व्यक्ति या व्यवस्था शास्त्रों के विरुद्ध कार्य करती है, उसे न सुख मिलता है, न शांति और न ही सद्गति।”
जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने आगे जोर देकर कहा कि वे स्वयं शास्त्रानुसार पैदल ही संगम स्नान के लिए जाते हैं और धर्म के नियमों से कभी समझौता नहीं करते। शास्त्र की मर्यादा सर्वोपरि है और उसके विरुद्ध कोई भी आचरण अंततः विनाश का कारण बनता है। उन्होंने रोके जाने की घटना को दुर्भाग्यपूर्ण माना, लेकिन मुख्य दोष स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के रथ पर सवार होने में ठहराया। साथ ही, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जारी नोटिस (जिसमें शंकराचार्य पद के दावे पर स्पष्टीकरण मांगा गया) को उचित ठहराया।
घटना के विवरण में, मौनी अमावस्या को भारी भीड़ के बीच स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जुलूस संगम तक पहुंचा, लेकिन प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के कारण उन्हें रथ से उतरकर पैदल जाने को कहा। इससे उनके शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हुई, पालकी/छत्र क्षतिग्रस्त हुआ और अंततः स्वामी ने स्नान करने से इनकार कर दिया। उन्होंने प्रशासन पर परंपरा भंग और अपमान का आरोप लगाया, जबकि मेला प्रशासन ने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार वाहन से घाट तक पहुंचना प्रतिबंधित है, ताकि भगदड़ जैसी स्थिति न बने।
यह बयान धार्मिक अनुशासन, शास्त्र-पालन और मेला नियमों के पालन पर जोर देता है, जिससे संत समाज में गहन चर्चा छिड़ गई है। कई संतों और श्रद्धालुओं ने शास्त्र मर्यादा को प्राथमिकता देने की बात दोहराई है, जबकि कुछ पक्षों में प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल भी उठ रहे हैं।

