काशी में 483 साल पुराना भरत मिलाप सकुशल संपन्न
प्रभु श्रीराम और भरत के मिलन को देखकर श्रद्धालु हो उठे भावविभोर
वाराणसी। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में गुरुवार को ऐतिहासिक नाटी इमली मैदान पर विश्वप्रसिद्ध भरत मिलाप का आयोजन श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। भगवान श्रीराम और उनके अनुज भरत के महामिलन का अलौकिक दृश्य देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़े। पूरा क्षेत्र ‘हर-हर महादेव’ और ‘सियावर रामचंद्र की जय’ के जयकारों से गूंज उठा। महज 3 मिनट 36 सेकंड का यह भावुक क्षण काशी की सदियों पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा की जीवंत झलक बना।


चित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक पं. मुकुंद उपाध्याय के अनुसार, संत मेघा भगत से जुड़ी इस परंपरा का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यंत विशेष है। इस वर्ष तिथियों के अंतर के कारण भरत मिलाप का आयोजन विजयादशमी के दो दिन बाद 22 अक्टूबर को हुआ। काशी की इस ऐतिहासिक लीला की परंपरा लगभग 483 वर्ष पुरानी बताई जाती है।

निर्धारित मुहूर्त पर पुष्पक विमान के प्रतीक रथ से भगवान श्रीराम के उतरने और भरत को गले लगाने का दृश्य आकर्षण का केंद्र रहा। प्रभु श्रीराम और भरत के मिलन को देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। कुछ ही मिनटों में संपन्न होने वाला यह प्रसंग भाई के प्रति प्रेम, त्याग, समर्पण और पारिवारिक मर्यादा का संदेश देता है।
नाटी इमली मैदान के साथ जैतपुरा, लोहटिया और मैदागिन तक श्रद्धालुओं की भारी मौजूदगी रही। भीड़ को देखते हुए आयोजन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। काशी की इस ऐतिहासिक लीला को देखने के लिए आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
काशी का भरत मिलाप केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि शहर की जीवंत सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में भगवान श्रीराम और भरत का मिलन हर वर्ष श्रद्धालुओं को प्रेम, त्याग और भाईचारे का संदेश देता है। ‘सियावर रामचंद्र की जय’ के उद्घोष के बीच यह ऐतिहासिक आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ।

