राहुल की राह में रोड़ा बने लालू? नीतीश के साथ छोड़ने से बिगड़ा इंडिया ब्लॉक का खेल

राहुल की राह में रोड़ा बने लालू? नीतीश के साथ छोड़ने से बिगड़ा इंडिया ब्लॉक का खेल
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पटना। नरेंद्र मोदी को तीसरी बार पीएम पद की शपथ लेते देख इंडिया ब्लॉक के नेताओं के सीने पर यकीनन सांप लोट गया होगा। खासकर कांग्रेस के हाथ आया एक बड़ा अवसर निकल गया। एनडीए में सब कुछ ठीक रहा तो कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को अब पांच साल बाद ही ऐसा मौका मिलेगा। किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में अनुमान लगाया जा रहा था कि इंडिया ब्लॉक परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढालने में कामयाब हो जाएगा। इसके लिए उसने कोशिशें भी कीं। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू को उनके करीबी विपक्षी नेताओं ने मनाने की कोशिशें भी कीं। केसी त्यागी की मानें तो इंडिया ब्लॉक ने नीतीश को पीएम बनाने का ऑफर भी दिया। हालांकि जेडीयू के ही राज्यसभा सदस्य संजय झा इसे गलत बताते हैं और नीतीश कुमार ने भी इस बाबत कुछ नहीं कहा है।

नीतीश-नायडू को मनाने की कोशिशें नाकाम हुईं
केसी त्यागी की बात ही कुछ देर के लिए मान लेते हैं कि नीतीश कुमार को इंडिया ब्लॉक से शरद पवार ने फोन किया था। पर, नीतीश ने क्या जवाब दिया, इस दोतरफा वार्तालाप की जानकारी न नीतीश ने दी और न शरद पवार ने। इसलिए इस पर यकीन करना उचित नहीं, पर केसी त्यागी की बात को झुठलाया नहीं जा सकता। वो जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता के अलावा सलाहकार भी हैं। उनके बयान को अधिकृत ही माना जाना चाहिए। ऐसी ही बातें आंध्र प्रदेश का सीएम बनने जा रहे टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू के बारे में भी कही जा रही हैं। बताया जा रहा है कि उन्हें तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने फोन किया था। उनको स्टालिन के फोन और उस पर नायडू के जवाब की भी जानकारी अधिकृत तौर पर किसी ने नहीं दी है। लेकिन अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि नरेंद्र मोदी ने जिस तरह एनडीए को एकजुट रखा, उसी तरह इंडिया ब्लाक ने भी अपने पुराने साथियों- नीतीश और नायडू को पटाने की कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ी होगी।

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नायडू एनडीए के पुराने साथी,पर मोदी विरोधी रहे
चंद्रबाबू नायडू तो अटल बिहारी वाजपेयी के जमाने से एनडीए के सहयोगी रहे हैं। वाजपेयी की सरकार को टीडीपी ने बाहर से समर्थन दिया था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद 2018 में नायडू ने एनडीए से दूरी बना ली। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और उसके पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता का उन्होंने अभियान चलाया था। कोलकाता से लेकर दिल्ली तक विपक्षी दलों की बैठकें और सामूहिक रैलियां भी हुई थीं। हालांकि तब नायडू को कामयाबी नहीं मिली और सीएम की उनकी कुर्सी भी हाथ से निकल गई थी। तब से उनका राजनीतिक वनवास चल रहा था। लोकसभा और विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें एक मामले में जेल भी जाना पड़ा। जेल से निकल कर वे भाजपा के संपर्क में आए और एनडीए फोल्ड में रह कर चुनाव लड़ने का फैसला किया। परिणाम सामने है। टीडीपी के 16 सांसद चुन कर लोकसभा पहुंचे हैं। टीडीपी अब केंद्र में तीसरी बार बनी नरेंद्र मोदी की सरकार में शामिल भी हो गई है। नायडू को इस बात की भी पीड़ा रही होगी कि जिन दिनों विपक्षी एकता की बातचीत परवान चढ़ रही थी, किसी ने नायडू की सुधि नहीं ली। जब उनके पास 16 सांसद हो गए तो इंडिया बलाक ने उन्हें 2019 की याद दिला कर साथ लाने की असफल कोशिश की।

नीतीश ने भी मोदी के खिलाफ खोला था मोर्चा
नीतीश कुमार ने महागठबंधन के साथ रहते 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर 2023 से ही विपक्षी एकजुटता का प्रयास शुरू किया था। विपक्ष के बड़े नेताओं से जाकर वे मिले। उन्हें एकजुटता अभियान में शामिल किया। पहली बैठक भी ममता बनर्जी की सलाह पर नीतीश ने पटना में रखी। नीतीश के प्रयास की खासियत यह रही कि उन्होंने कांग्रेस से खार खाए दो नेताओं को एक टेबल पर बैठने के लिए राजी कर लिया। उनमें एक दिल्ली के सीएम और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल थे तो दूसरी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी थीं। दोनों की कांग्रेस से पुरानी रंजिश रही है। नीतीश के आग्रह पर ये दोनों भी पटना की बैठक में शामिल हुए और बाद की बैठकों में भी शामिल होते रहे। चूंकि नीतीश ने विपक्षी दलों के संयोजन का काम करते वक्त यह क्लीयर कर दिया था कि वे पीएम पद की लालसा नहीं रखते हैं, इसलिए यह माना जा रहा था कि उन्हें विपक्षी गठबंधन का संयोजक बना दिया जाएगा। विपक्षी दलों की कई बैठकें हुईं,लेकिन नीतीश को संयोजक पद नहीं मिला। इस पर राहुल गांधी ने सफाई दी कि कांग्रेस को एतराज नहीं है, लेकिन ममता बनर्जी उन्हें संयोजक बनाने के पक्ष में नहीं हैं। यह बताते हुए राहुल गांधी ने नीतीश को संयोजक पद ऑफर किया, लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया। फजीहत के बाद इस पद का नीतीश के लिए कोई मोल भी नहीं था। वैसे भी पटना के बाद विपक्षी गठबंधन की जितनी बैठकें हुईं, उनमें नीतीश की सलाह कोई मानने को तैयार नहीं था। आखिरकार नीतीश ने भाजपा से हाथ मिला लिया और कभी साथ न छोड़ने की सार्वजनिक घोषणा के साथ एनडीए के भरोसेमंद साथी बने रहने में ही भलाई समझी।

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नीतीश-नायडू साथ रहते को पीएम बन जाते राहुल
कहते हैं, किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता। कांग्रेस ने अपनी स्थिति पिछले मुकाबले थोड़ी अच्छी कर ली और उसके सांसदों की संख्या इस बार 99 हो गई। इंडिया ब्लॉक की पार्टियां भी एकजुट रहीं। इस तरह विपक्षी गठबंधन के पास 234 सीटें आ गईं, जो बहुमत से 38 कम थीं। निर्दलीय और छोटे दलों के जीते 16 सांसद भी उसके साथ आ जाते, क्योंकि उनमें एक-दो को छोड़ कर बाकी तो आजाद ख्यालों के हैं। इंडिया ब्लाक से उनकी विचारधारा भी मेल खाती है। नीतीश कुमार की पार्टी के 12 सांसद और चंद्रबाबू नायडू के 16 सांसद इस बार जीते हैं। यानी इंडिया ब्लाक ने इनकी उपेक्षा नहीं की होती तो दोनों के 28 सांसद भी उसके साथ होते। तब कांग्रेस बड़ी पार्टी होने के करण सरकार जरूर बना लेती और राहुल गांधी पीएम बन जाते।

राहुल के पीएम न बन पाने की वजह लालू
नीतीश को बिदकाने में कांग्रेस से अधिक दोष आरजेडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का है,जिन्होंने अपने घर राहुल गांधी को मटन खिला कर ऐसा पटाया कि बिहार में मनमाने फैसले की छूट उन्हें मिल गई। लालू ने सबसे पहले राहुल गांधी को दूल्हा बनाने की बात कह कर नीतीश की राह में रोड़े अंटकाए। नीतीश टिकट बंटवारे में जल्दबाजी चाहते थे, लेकिन लालू ने लटकाए रखा। संयोजक का पद मिला नहीं। अब नीतीश को लगने लगा कि टिकट बंटवारे में उन्हें कहीं लालू ऐन वक्त धोखा न दे दें। नीतीश कुमार पर बिहार की गद्दी छोड़ने का आरजेडी का दबाव अलग से था। उसी दबाव के कारण नीतीश को ऐलान करना पड़ा था कि 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। लालू ने शायद इसे नीतीश की चाल समझी और उन्हें किनारे करने में अपने स्तर से कोई कमी नहीं की। चुनाव परिणाम आते ही उसी नीतीश को मनाने की इंडिया ब्लाक कोशिश करता रहा, जिन्हें कभी साइडलाइन कर दिया गया था। यानी लालू की वजह से ही नीतीश को एनडीए के साथ जाने की मजबूरी हुई और राहुल गांधी पीएम बनने से चूक गए।

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