साल का पहला चंद्रग्रहण 3 मार्च को, सूतक, समय और वैज्ञानिक-धार्मिक महत्व
कोलकाता/नई दिल्ली (जनवार्ता)। वर्ष 2026 का पहला चंद्रग्रहण 3 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा के दिन लगने जा रहा है। खगोलीय गणनाओं के अनुसार यह चंद्रग्रहण दोपहर 3:20 बजे शुरू होकर शाम 6:47 बजे तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण से लगभग नौ घंटे पहले सूतक काल प्रभावी हो जाएगा। सूतक लगते ही मंदिरों में पूजा-अर्चना स्थगित कर दी जाएगी और कपाट बंद रहेंगे।

वैज्ञानिक दृष्टि से चंद्रग्रहण तब होता है, जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाती है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ती है। यह खगोलीय घटना केवल पूर्णिमा के दिन ही संभव होती है। जब चंद्रमा पृथ्वी की पूर्ण छाया यानी उम्ब्रा में प्रवेश करता है, तब पूर्ण चंद्रग्रहण होता है, जबकि आंशिक छाया पड़ने की स्थिति में इसे आंशिक चंद्रग्रहण कहा जाता है। ग्रहण के दौरान चंद्रमा कभी-कभी लालिमा लिए दिखाई देता है, जिसे ‘ब्लड मून’ कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह पृथ्वी के वायुमंडल में सूर्य के प्रकाश के प्रकीर्णन का परिणाम होता है, जिसमें लाल तरंगदैर्ध्य का प्रकाश चंद्रमा तक पहुंचता है। विशेषज्ञों का कहना है कि चंद्रग्रहण को नंगी आंखों से देखना पूरी तरह सुरक्षित होता है।
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार चंद्रग्रहण से नौ घंटे पूर्व सूतक काल शुरू हो जाता है। यदि ग्रहण दोपहर 3:20 बजे प्रारंभ हो रहा है, तो सूतक सुबह लगभग 6:20 बजे से माना जाएगा। इस अवधि में पूजा-पाठ, शुभ कार्य और भोजन करना वर्जित रहता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गर्भवती महिलाओं को इस दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के समय राहु नामक असुर ने देवताओं के बीच बैठकर अमृत पान कर लिया था। यह जानने पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। अमृत के प्रभाव से राहु का सिर अमर हो गया और मान्यता है कि वही समय-समय पर सूर्य और चंद्रमा को ग्रसता है, जिससे ग्रहण लगता है। धार्मिक ग्रंथों में ग्रहण काल को मंत्रजाप, साधना और दान के लिए विशेष फलदायी बताया गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान, दान-पुण्य और मंत्रजाप का विशेष महत्व होता है, जबकि सूतक और ग्रहण काल में भोजन करने तथा किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से परहेज किया जाता है।
कुल मिलाकर 3 मार्च को पड़ने वाला यह चंद्रग्रहण खगोलीय दृष्टि से एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटना है, वहीं धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं में भी इसका विशेष स्थान है। विज्ञान इसे एक सामान्य खगोलीय प्रक्रिया मानता है, जबकि आस्था से जुड़े लोग इसे आध्यात्मिक साधना का अवसर मानते हैं। इस तरह यह चंद्रग्रहण विज्ञान और विश्वास—दोनों के संगम के रूप में देखा जा रहा है।

