अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार पर लगाया सनातन विरोधी होने का आरोप
वाराणसी (जनवार्ता) । प्रयागराज के माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए विवाद ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी हैं। मौनी अमावस्या यानी को संगम स्नान के लिए पालकी में जा रहे स्वामी जी को मेला प्रशासन ने रोका था। प्रशासन ने भीड़भाड़ और भगदड़ की आशंका बताकर उन्हें पैदल चलकर स्नान करने को कहा, जबकि स्वामी जी और उनके समर्थकों ने इसे धार्मिक अपमान और शंकराचार्य की मर्यादा का उल्लंघन बताया। इस दौरान पुलिस और शिष्यों के बीच झड़प हुई, जिसमें लाठीचार्ज, धक्का-मुक्की और शिखा (चोटी) पकड़कर अपमानित करने के गंभीर आरोप लगे।

विरोध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपना शिविर के बाहर धरना दिया, अन्न-जल त्याग कर अनशन किया और करीब 10-11 दिनों तक संयम बनाए रखा। उन्होंने माफी मांगने या दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई लिखित आश्वासन या संतोषजनक कदम नहीं उठाया गया। अंततः भारी मन से उन्होंने बिना संगम स्नान किए माघ मेला छोड़ दिया और 28 जनवरी को काशी (वाराणसी) लौट आए। लौटते समय उन्होंने कहा कि इतिहास में पहली बार कोई शंकराचार्य बिना स्नान के प्रयागराज की पवित्र धरती छोड़ रहा है, जो उनके अंतर्मन को गहरी चोट पहुंचा रहा है।
काशी पहुंचकर स्वामी जी ने मीडिया से बातचीत में उत्तर प्रदेश सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कुछ लोग साधु-संतों का चोला पहने हुए हैं, लेकिन उनके कार्य राक्षसों जैसे हैं। उन्होंने ब्राह्मणों, गायों, मंदिरों और परंपरागत मूर्तियों पर हमले का आरोप लगाया, यूपी को गाय निर्यात में अग्रणी बताया और मूर्तियां तोड़ने को औरंगजेब काल जैसा करार दिया। एक मंत्री द्वारा उन्हें ‘कालनेमी’ कहे जाने पर प्रमाण मांगते हुए कहा कि साधु-संतों और मंदिरों से सच्चा लगाव हो तो ऐसी घटनाओं पर दर्द होना चाहिए।
स्वामी जी ने लाठीचार्ज को असली संतों के अलावा ब्रह्मचारियों, साध्वियों, बुजुर्गों और बच्चों तक पहुंचने वाला बताया तथा सरकार को ब्राह्मण-विरोधी और सनातन धर्म विरोधी करार दिया। उनका कहना था कि ढोंगी और सच्चे संत अलग होते हैं, संत कभी विभाजित नहीं हो सकते और यह सब हिंदू समाज को बांटने की साजिश है, जिससे लोकतंत्र और न्याय पर जनता का विश्वास कमजोर हो रहा है।
प्रशासन का पक्ष है कि नियमों का पालन नहीं हुआ, भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा के लिए रोका गया तथा पालकी रोकना आवश्यक था। विवाद अब राजनीतिक रंग ले चुका है, जहां विपक्ष इसे सनातन विरोधी बताकर योगी सरकार को घेर रहा है। कुछ संतों ने स्वामी जी का समर्थन किया है, जबकि अन्य पक्षों में मतभेद दिख रहे हैं। यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां सीबीआई जांच और अधिकारियों के निलंबन की मांग की गई है।

