महाशिवरात्रि पर अघोरपीठ में ऐतिहासिक क्षण: क्रीं-कुण्ड में पहली बार शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा
वाराणसी (जनवार्ता) ।महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर अघोर-परंपरा के विश्वविख्यात सिद्धपीठ बाबा कीनाराम स्थल, क्रीं‑कुण्ड में एक ऐतिहासिक एवं विलक्षण आध्यात्मिक घटनाक्रम साकार हुआ। इस सिद्धपीठ में पहली बार विधि-विधान के साथ शिवलिंग की स्थापना एवं प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई।


अघोर-परंपरा से परिचित श्रद्धालुओं के लिए यह स्थल आस्था का प्रमुख केंद्र है। वाराणसी स्थित इस परिसर में पारंपरिक मंदिरों के स्थान पर अघोर-परंपरा के सर्वमान्य आचार्य अघोराचार्य महाराजश्री बाबा कीनाराम जी, महान औघड़ पीर बाबा राजेश्वर राम जी, तथा विश्वविख्यात संत **अघोरेश्वर महाप्रभु बाबा अवधूत भगवान राम जी** की मूर्तियाँ एवं समाधियाँ विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त अघोर एवं तंत्र की कुलदेवी मानी जाने वाली माता हिंगलाज भी यहां प्रतिष्ठित हैं। इस पीठ पर आस्था का केंद्र मुख्यतः संतों की समाधियाँ रही हैं, जिन्हें श्रद्धालु ईश्वरीय स्वरूप मानकर पूजते हैं।

15 फ़रवरी 2026 को महाशिवरात्रि के अवसर पर पीठाधीश्वर अघोराचार्य महाराजश्री बाबा सिद्धार्थ गौतम राम जी के कर-कमलों द्वारा परिसर में पहली बार एक मंदिर की स्थापना की गई तथा शिवलिंग की विधिवत प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इस अवसर के साक्षी बने अघोर-श्रद्धालुओं के लिए यह क्षण अत्यंत अद्भुत, भावविभोर करने वाला और अविस्मरणीय रहा।
उल्लेखनीय है कि भगवान शिव से अविर्भूत मानी जाने वाली अघोरी/औघड़ परंपरा में महान संतों को साक्षात शिव-स्वरूप में पूजा जाता है। परंपरा के अनुसार, संतों के समाधिस्थ होने के उपरांत उनकी समाधि पर शिवलिंग स्थापित किए जाते हैं और श्रद्धालु उन्हें शिव के प्रतीकात्मक स्वरूप के रूप में पूजते हैं। ऐसे में इस महान अघोरपीठ में पहली बार शिवलिंग की स्वतंत्र स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा आध्यात्मिक जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है।

