बीएचयू में यूजीसी ‘काला कानून’ के खिलाफ विशाल जुलूस
सुप्रीम कोर्ट ने नियमों पर लगाई रोक, छात्रों में जश्न का माहौल
वाराणसी (जनवार्ता)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में गुरुवार को यूजीसी की नई ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समता संवर्धन नियमावली, 2026′ के खिलाफ छात्रों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया। विश्वनाथ मंदिर से शुरू हुआ यह विशाल जुलूस बीएचयू मुख्य द्वार तक पहुंचा, जहां यूजीसी काला कानून वापस लो’, ‘यूजीसी रोल बैक’ और ‘समानता की आड़ में भेदभाव’ जैसे नारे गूंजते रहे। छात्रों ने इन नियमों को शिक्षा की स्वतंत्रता और समानता के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताते हुए पूर्ण वापसी की मांग की। हजारों छात्रों ने प्लेकार्ड और बैनर लहराते हुए कहा कि ये नियम सामान्य वर्ग के छात्रों की स्वतंत्रता छीनेंगे, कैंपस में दोस्ती-रिश्तों में जाति का हस्तक्षेप बढ़ाएंगे और झूठी शिकायतों से उत्पीड़न का खतरा पैदा करेंगे। एक छात्र ने कहा कि ये नियम एससी/एसटी/ओबीसी की सुरक्षा के नाम पर सामान्य छात्रों को दोयम दर्जे का बना देंगे, जिससे शिक्षा में असमानता बढ़ेगी, न कि कम होगी। विरोध के दौरान कुछ छात्रों ने यूजीसी अधिसूचना की प्रतियां भी जलाईं।


विरोध के बीच विश्वनाथ मंदिर परिसर में कुछ छात्रों ने नियमों के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान चलाया, जिसे पुलिस ने हटाने की कोशिश की। इससे कुछ देर तनावपूर्ण माहौल बना, लेकिन छात्र एकजुट होकर अपनी मांग पर अड़े रहे। पुलिस ने स्थिति संभाल ली और किसी बड़ी घटना को टाल दिया। यह आंदोलन बीएचयू तक सीमित नहीं रहा। पूरे उत्तर प्रदेश और देशभर में छात्र सड़कों पर उतरे। वाराणसी में बीएचयू के अलावा महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के छात्र भी प्रदर्शन में शामिल हुए। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने ज्ञापन सौंपे और नारेबाजी की।
प्रदर्शन के बीच सबसे बड़ी खबर सुप्रीम कोर्ट से आई, जहां अदालत ने इन नियमों को तत्काल स्थगित कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमलया बागची की पीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए नियमों को ‘प्रथम दृष्टया अस्पष्ट’ और ‘दुरुपयोग की संभावना वाला’ करार दिया। अदालत ने कहा कि नियम 3(सी) में जातिगत भेदभाव की परिभाषा स्पष्ट नहीं है, जिससे इसका मनमाने ढंग से इस्तेमाल हो सकता है। केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि फिलहाल 2012 की यूजीसी नियमावली (जो गैर-बाध्यकारी दिशानिर्देश हैं) ही लागू रहेगी। नियमों को अब ‘एबेयेंस’ में रखा गया है और अगली सुनवाई 19 मार्च को प्रस्तावित है। इस फैसले के बाद बीएचयू कैंपस में छात्रों ने मिठाइयां बांटीं, गुलाल लगाकर जश्न मनाया और इसे ‘बड़ी जीत’ बताया। कई संगठनों ने होली जैसा उत्सव मनाया, लेकिन स्पष्ट किया कि आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक नियम पूरी तरह वापस नहीं लिए जाते।
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को ये नियम अधिसूचित किए थे, जिनमें उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्विटी कमेटी, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग टीम बनाने का प्रावधान है। उद्देश्य जातिगत भेदभाव रोकना बताया गया था, लेकिन विरोधियों का कहना है कि ये केवल एससी/एसटी/ओबीसी तक सीमित हैं, जबकि सामान्य वर्ग के छात्रों को समान सुरक्षा नहीं मिलती। इससे कैंपस में सामाजिक विभाजन बढ़ने का डर जताया जा रहा है। अदालत ने भी टिप्पणी की कि क्या हम जाति-रहित समाज की दिशा में पीछे जा रहे हैं।
छात्र संगठन आंदोलन जारी रखने की बात कह रहे हैं। शिक्षकों और सामाजिक संगठनों ने भी एकजुटता दिखाई है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस अब समानता और समान अधिकार की बड़ी बहस बन चुकी है। आगे की घटनाक्रम पर नजर रखी जा रही है।

