इल्म के लिए हूं, फिल्म के लिए नहीं”: पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम ने बनारस लिट फेस्ट में साझा किए जीवन के अनमोल विचार

इल्म के लिए हूं, फिल्म के लिए नहीं”: पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम ने बनारस लिट फेस्ट में साझा किए जीवन के अनमोल विचार

वाराणसी (जनवार्ता)। बनारस लिट फेस्ट-4 के दूसरे दिन शनिवार को ज्ञान गंगा सभागार में उर्दू के प्रसिद्ध शायर पद्मश्री शीन काफ़ निज़ाम ने अपनी शायरी, जीवन दर्शन और साहित्यिक यात्रा पर दिल खोलकर बात की। ‘शब्द यात्रा’ सत्र में प्रतीक द्विवेदी के संचालन में उन्होंने स्पष्ट कहा, “मैं इल्म के लिए हूं, फिल्म के लिए नहीं।”

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बनारस की साहित्यिक विरासत का जिक्र करते हुए शीन काफ़ निज़ाम ने बताया कि यहीं मिर्जा गालिब ने ‘चराग-ए-दैर’ लिखा था, जिसका सबसे सुंदर अनुवाद प्रोफेसर अमृतलाल इस्सर ने किया। उन्होंने खुद को आलिम न बताते हुए कहा, “मैं आलिम तो नहीं हूं, लेकिन मैंने आलिमों को देखा है। अपनी आंखों का शुक्रिया अदा करता हूं कि इल्म वालों को देख सका।”

एक सवाल के जवाब में उन्होंने खुलासा किया कि स्कूल की किताबों के बाद सबसे पहले महाभारत पढ़ी और आज भी उसका आशिक हूं। पुनर्जन्म में विश्वास जताते हुए उन्होंने कहा, “सवाल शाश्वत होता है, जवाब बेवफा होता है जो हर बार बदल जाता है।”

मुशायरा और कवि सम्मेलनों की बदलती तस्वीर पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा, “संयोजक, आयोजक और सुनने वाले इसके जिम्मेदार हैं। हर सुनने वाला श्रोता नहीं होता, हर पढ़ने वाला पाठक नहीं होता। आज हिंदी और उर्दू दोनों ने पाठक खो दिए हैं। पहले मुशायरे तमीज और तहजीब सिखाने का मंच थे, अब इसे बिगड़ना कहना भी अच्छा लफ्ज नहीं।”

शीन काफ़ निज़ाम (जन्म नाम: शिव किशन बिस्सा) उर्दू साहित्य के महत्वपूर्ण कवि हैं। ‘गुमशुदा दैर की गूंजती घंटियां’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले निज़ाम को हाल ही में (2025 में) पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। बनारस लिट फेस्ट में उनका यह सत्र साहित्य प्रेमियों के लिए बेहद यादगार साबित हुआ, जहां उन्होंने ज्ञान, संस्कृति और शायरी की गहराई को छुआ।

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Shiv murti

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