तेरे चरणों मैं मुझको जगह देना | समर्पण और भक्ति का पावन भाव
“तेरे चरणों मैं मुझको जगह देना” — यह पंक्ति भक्त की विनम्र प्रार्थना है जिसमें वह अपने जीवन को ईश्वर के चरणों में पूरी तरह समर्पित करता है। यह केवल शब्द नहीं, बल्कि मन और आत्मा का पूर्ण समर्पण है। भक्त चाहता है कि उसके जीवन की हर सोच, हर कर्म, और हर भावना प्रभु के चरणों में सुरक्षित और पूर्ण रूप से स्थित हो। यह भाव हमें सिखाता है कि भक्ति का असली अर्थ है अहंकार छोड़कर, अपने मन और हृदय को ईश्वर की शरण में समर्पित करना।

भाव से भक्ति करने की विधि
- दिन और समय: किसी भी शुभ दिन जैसे सोमवार या शुक्रवार प्रातःकाल या संध्या समय।
- स्थान: अपने पूजा स्थल या मंदिर में ईश्वर की मूर्ति/चित्र के सामने दीपक और धूप रखें।
- सामग्री: पुष्प, तुलसीदल, जल, मिश्री या अन्य नैवेद्य।
- प्रारंभ: “हे प्रभु, मुझे अपने चरणों में स्थान दो” बोलकर ध्यान लगाएँ।
- भजन या जप: इस भाव से कोई भजन या मंत्र जप करें जैसे “ॐ नमः शिवाय” या “जय श्रीराम/कृष्ण”।
- भावना रखें: यह अनुभव करें कि आप अपने जीवन को पूरी तरह ईश्वर के चरणों में समर्पित कर रहे हैं।
- समापन: अंत में प्रार्थना करें — “हे प्रभु, मेरे जीवन की हर चीज़ आपके चरणों में रहे, मुझे केवल आपके प्रेम और कृपा की प्राप्ति हो।”
समर्पण से मिलने वाले लाभ
- आत्मिक शांति: मन की उलझनें और चिंता दूर होती हैं।
- भक्ति में गहराई: आत्मा ईश्वर के प्रेम में पूर्ण रूप से लीन हो जाती है।
- संकटों से मुक्ति: जीवन की कठिनाइयाँ प्रभु की कृपा से आसान हो जाती हैं।
- सकारात्मक जीवन ऊर्जा: समर्पण से मन में शक्ति, धैर्य और विश्वास बढ़ता है।
- ईश्वर के निकटता का अनुभव: हृदय में ईश्वर का वास स्थिर होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
निष्कर्ष
“तेरे चरणों मैं मुझको जगह देना” — यह पंक्ति केवल एक प्रार्थना नहीं, बल्कि जीवन को ईश्वर के चरणों में पूरी तरह समर्पित करने की प्रेरणा है। जब भक्त अपने अहंकार को छोड़कर पूर्ण समर्पण करता है, तो उसका जीवन संतोष, आनंद और आध्यात्मिक शक्ति से भर जाता है। प्रभु के चरणों में स्वयं को रखकर, हर मुश्किल आसान लगती है और हृदय में सच्चा प्रेम और शांति स्थायी रूप से स्थापित हो जाती है।

