कान्हा कैसी करी है चतुराई रे | नटखट कान्हा की लीलाओं का मधुर स्मरण

“कान्हा कैसी करी है चतुराई रे” — यह पंक्ति ब्रज की गोपियों के उस मीठे स्नेह को दर्शाती है जिसमें वे श्रीकृष्ण की नटखट लीलाओं को याद करती हैं। मक्खन चुराना हो या मुरली बजाकर सबको मोहित करना — कान्हा की हर चतुराई प्रेम और आनंद से भरी होती है। इस भाव में भक्त अपने श्यामसुंदर को मान-मनुहार से पुकारते हैं, क्योंकि उनकी चंचलता में भी गहरा आध्यात्मिक संदेश छिपा होता है — कि जीवन को प्रेम, खेल और भक्ति से भर देना ही असली आनंद है।

rajeshswari

कान्हा, कैसी, करी है, चतुराई रे,
यह मेरी, समझ, नहीं आई रे ll

तूने, मथुरा, नगरी में, जन्म लिया।
तेरे, एक पिता, दो मात हुई।
गोकुल में, बंटी, बधाई रे,
यह मेरी, समझ, नहीं आई रे l
कान्हा, कैसी, करी है,,,,,,,,,,,,,,,,,

तूने, ग्वाल, बाल का, साथ दिया l
तूने, काली, नाग को, नाथ लिया l
यमुना पे, गऊ, चराई रे,
यह मेरी, समझ, नहीं आई रे l
कान्हा, कैसी, करी है,,,,,,,,,,,,,,,,,

तूने, राधा, का मन, मोह लिया l
तूँ तो, घट घट में भी, समा ही गया ll
तूने, कैसी, प्रीत निभाई रे,
यह मेरी, समझ नहीं आई रे l
कान्हा, कैसी, करी है,,,,,,,,,,,,,,,,,

तूँ, मथुरा, नगरी, जब चल पड़ा l
मामा का, वैरी, बनने गया ।l
मां, बाप की, जेल छुड़ाई रे,
यह मेरी, समझ, नहीं आई रे l
कान्हा, कैसी, करी है,,,,,,,,,,,,,,,,,

तूने, यार, सुदामा, बना लिया l
तूने, नगरी, अपनी, बुला लिया ll
मल, मल के, पैर धुलाई रे,
यह मेरी, समझ, नहीं आई रे l
कान्हा, कैसी, करी है,,,,,,,,,,,,,,,,,

तुम, नर सिंह के, संग जब चल पड़े l
तूने, दुखियों के, दुःख दूर किए ll
बने, हर, नंदी के, भाई रे,
यह, मेरी, समझ, नहीं आई रे l
कान्हा, कैसी, करी है,,,,,,,,,,,,,,,,,

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राणा ने, प्याला, भेज दिया l
तुम तो, प्याले के, अंदर, समा ही गए ll
मीरा को, दिए, दिखाई रे,
यह मेरी, समझ, नहीं आई रे l
कान्हा, कैसी, करी है,,,,,,,,,,,,,,,,,

तुम तो, महाँ, भारत में, पहुँच गए l
अर्जुन के, रथ को, हाँक रहे ll
तूने, धर्म की, लाज़ बचाई रे,
यह मेरी, समझ नहीं आई रे l
कान्हा, कैसी, करी है,,,,,,,,,,,,,,,,,

भाव से भक्ति करने की विधि

  1. दिन और समय: बुधवार या शुक्रवार का दिन श्रेष्ठ माना जाता है।
  2. स्थान: घर के पूजास्थल या मंदिर में श्रीकृष्ण की बालरूप मूर्ति के सामने दीपक जलाएँ।
  3. सामग्री: तुलसीदल, मक्खन-मिश्री, पीले पुष्प और धूप अर्पित करें।
  4. प्रारंभ: “राधे-कृष्ण” का नाम लेकर मुरलीधारी का ध्यान करें।
  5. भजन या जप: प्रेमपूर्वक “कान्हा कैसी करी है चतुराई रे” भजन का गान करें।
  6. भावना रखें: मन में यह भाव रखें कि आप ब्रज की गलियों में हैं और कान्हा अपनी चतुराई से सबको आनंदित कर रहे हैं।
  7. समापन: श्रीकृष्ण से प्रार्थना करें — “हे नटखट श्याम, अपने इस प्रेममय स्वभाव से मेरे जीवन में भी आनंद और सरलता भर दो।”

इस भक्ति से मिलने वाले लाभ

  • हृदय में प्रेम का संचार: श्रीकृष्ण की लीलाओं से हृदय में कोमलता और स्नेह बढ़ता है।
  • मानसिक प्रसन्नता: भक्ति से मन हल्का और प्रसन्न रहता है।
  • आध्यात्मिक जुड़ाव: ईश्वर के प्रति आत्मीय संबंध गहरा होता है।
  • संकटों से मुक्ति: कान्हा की कृपा से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं।
  • भक्ति की मधुरता: मन में निरंतर प्रेम और भक्ति की भावना बनी रहती है।

निष्कर्ष

“कान्हा कैसी करी है चतुराई रे” — यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि जीवन की गंभीरता में भी मुस्कान और खेल की जगह बनी रहनी चाहिए। कान्हा की चतुराई केवल शरारत नहीं, बल्कि प्रेम की शिक्षा है — जो हमें सिखाती है कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है स्नेह, भक्ति और विनम्रता। जब हम कान्हा की लीलाओं को स्मरण करते हैं, तो हमारे मन के सभी बोझ मिट जाते हैं और हृदय में आनंद का सागर उमड़ पड़ता है। सच में, कान्हा की हर चतुराई प्रेम की गहराई का ही दूसरा रूप है।

Shiv murti

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