भवम भवानी सहितं नमामि | शिव–शक्ति को संयुक्त रूप में नमन

भवम भवानी सहितं नमामि | शिव–शक्ति को संयुक्त रूप में नमन

भवम भवानी सहितं नमामि इसका अर्थ है मैं भगवान शिव और माता भवानी को संयुक्त रूप से नमन करता हूँ। यह वाक्य शिव–शक्ति के उस अभिन्न संबंध को दर्शाता है जहाँ दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। शिव बिना शक्ति के शव हैं और शक्ति बिना शिव के दिशाहीन। जब हम दोनों को साथ में प्रणाम करते हैं, तो हम सृष्टि के संतुलन, प्रेम और एकता को प्रणाम करते हैं। यह भाव भक्त के मन में स्थिरता, शांति और ईश्वर के प्रति गहरा समर्पण उत्पन्न करता है।

rajeshswari

कर्पूर गौरम करुणावतारम, संसार सारम, भुजगेन्द्र हारम।
सदा वसंतम, हृदयारविंदे, भवम भवानी सहितं नमामि ।।
शिव भोले भंडारी, शिव कल्याणकारी। शंभु भवभयहारी, करुणावतार,
भवानी सहितं नम्न बारम्बार ।।

आदगुरू परमेश्वर, सदाशिव सर्वेश्वर।
नीलकण्ठ नागेश्वर, आशुतोष भोलेश्वर ।।
के नाना, के ना ना, नाम धाम, लिंगरूप अवतारी – शिव.

सज रही जटाओं में, ज्ञान-गंगा, ज्ञान-गंगा।
माथे पै है सज रहा, दिव्य चंदा, दिव्य चंदा ।।
के डमरू, के डमरू त्रिशूलधारी, बैल की स्वरी शिव.

शिव शंकर कैलाश पर, दूर रहते अबादी से।
राम नाम रस पीकर, रहते हैं समाधि में ।।
के औढर, के औढरदानी शम्भु, ‘मधुप हरि’ हितकारी-शिव.

भाव से पूजन या ध्यान विधि

  1. दिन: सोमवार या शुक्रवार का दिन विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  2. स्थान: घर के मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. सामग्री: बेलपत्र, पुष्प, दीपक, धूप, गंगाजल, फल और मिठाई रखें।
  4. प्रारंभ: “ॐ नमः शिवाय” और “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे” मंत्रों का एक-एक बार जप करें।
  5. पूजन: भगवान शिव को जल अर्पित करें और माता भवानी को पुष्प अर्पित करें।
  6. ध्यान: दोनों के संयुक्त रूप का ध्यान करते हुए मन में कहें — “भवम भवानी सहितं नमामि।”
  7. समापन: प्रार्थना करें — “हे शिव–शक्ति, हमारे जीवन में संतुलन, शांति और करुणा बनाए रखें।”
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इस भक्ति से मिलने वाले लाभ

  • मन की एकाग्रता: शिव–शक्ति की संयुक्त उपासना से मन शांत और केंद्रित होता है।
  • संतुलन की प्राप्ति: जीवन में प्रेम और वैराग्य का संतुलन स्थापित होता है।
  • संकट निवारण: दोनों के आशीर्वाद से सभी बाधाएँ और भय दूर होते हैं।
  • भक्ति की गहराई: उपासना से आत्मा में भक्ति और करुणा का भाव बढ़ता है।
  • आध्यात्मिक उन्नति: साधक को आत्मज्ञान और ईश्वर के प्रति सच्चा समर्पण प्राप्त होता है।

निष्कर्ष

भवम भवानी सहितं नमामि यह वाक्य केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन का सत्य है। शिव और शक्ति सृष्टि के दो पक्ष हैं — एक स्थिरता का, दूसरा ऊर्जा का। जब हम दोनों को साथ में प्रणाम करते हैं, तो हम सम्पूर्णता को नमन करते हैं। यह भाव हमें यह सिखाता है कि जीवन में प्रेम, समर्पण और संतुलन ही ईश्वर की सच्ची आराधना है। शिव–शक्ति का यह संयुक्त स्मरण हमारे मन को शुद्ध और आत्मा को प्रकाशित करता है।

Shiv murti

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