लवकुश ने व्यथा जब सुनाई | प्रेम, करुणा और धर्म की गूंज
“लवकुश ने व्यथा जब सुनाई” — यह प्रसंग केवल एक कथा नहीं, बल्कि भक्ति, करुणा और सत्य का जीवंत उदाहरण है। जब भगवान श्रीराम के पुत्र लवकुश ने अपने पिता के समक्ष रामायण का पाठ सुनाया, तो उस क्षण में धर्म, प्रेम और भावनाओं का मिलन हुआ। यह घटना दिखाती है कि सच्चा प्रेम कभी नष्ट नहीं होता, चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही कठिन क्यों न हों। यह पंक्ति भक्त को सिखाती है कि सत्य और प्रेम की शक्ति हर रिश्ते को जोड़ सकती है, और ईश्वर के चरणों में समर्पण से हर व्यथा का अंत होता है।

लवकुश ने व्यथा जब सुनाई
रो पड़े राम रघुराई,
रो पड़े भरत लक्ष्मण ,आगई सबको रूलाई
लवकुश ने व्यथा जब सुनाई रो पड़े राम रघुराई…….
दर दर भटके तपोवन,महलो की राज कुमारी,
कुटिया में रहती वाल्मीकिके सीता है मा हमारी,
सीता मैया को बोलो रघुराई किस बात की सजा सुनाई…..
वन भटके लकड़ी बटोरन ,पनिया भरन को जाइ,
चूल्हे के धुंआ के संग ,सिया मैया रोटी बनाई,
कैसे बताऊ, मेरे रघुराई रातरात मैया को नींद न आई….
विधि इस भक्ति भाव का स्मरण करने की विधि
- स्थान और समय: शांत वातावरण में, सुबह या संध्या के समय बैठें।
- पूजा की तैयारी: श्रीराम, माता सीता, लवकुश और हनुमान जी के चित्र के सामने दीपक जलाएँ।
- प्रारंभिक ध्यान: कुछ क्षण मौन होकर “जय श्रीराम” का जाप करें और अपने मन को स्थिर करें।
- भावपूर्ण पाठ: “लवकुश ने व्यथा जब सुनाई” भजन या प्रसंग को श्रद्धा से सुनें या दोहराएँ।
- मन में भावना रखें: कल्पना करें कि आप स्वयं उस सभा में हैं जहाँ प्रेम और करुणा का अद्भुत संगम हो रहा है।
- समापन: अंत में प्रभु से यह प्रार्थना करें कि वे हमें भी सत्य और प्रेम के मार्ग पर चलने की शक्ति दें।
लाभ इस भाव से मिलने वाले आध्यात्मिक फल
- भावनात्मक शुद्धि: मन में प्रेम और करुणा का भाव बढ़ता है।
- धैर्य और संवेदना: दूसरों के दुख को समझने और साझा करने की क्षमता विकसित होती है।
- पारिवारिक संबंधों में मधुरता: जीवन में क्षमा और समझ बढ़ती है।
- भक्ति की गहराई: प्रभु श्रीराम और माता सीता के प्रति भक्ति दृढ़ होती है।
- सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा: धर्म और कर्तव्य की भावना मजबूत होती है।
निष्कर्ष
“लवकुश ने व्यथा जब सुनाई” — यह पंक्ति हमें याद दिलाती है कि सच्ची शक्ति केवल तलवार में नहीं, बल्कि प्रेम और सत्य में होती है। यह प्रसंग हमें ईश्वर के उस करुणामय रूप से परिचित कराता है जो हर हृदय की व्यथा सुनता और समझता है। जब हम इस भावना को अपने जीवन में उतारते हैं, तो हमारे रिश्ते, विचार और कर्म सब पवित्र हो जाते हैं। प्रभु श्रीराम का जीवन यही सिखाता है — कि सत्य, करुणा और प्रेम ही धर्म का वास्तविक स्वरूप हैं।

