‘15 साल की बच्ची ने कितना दर्द झेला, सोचिए’ — CJI सूर्यकांत भावुक

‘15 साल की बच्ची ने कितना दर्द झेला, सोचिए’ — CJI सूर्यकांत भावुक

सुप्रीम कोर्ट ने 31 हफ्ते की गर्भावस्था समाप्त करने का आदेश बरकरार रखा, AIIMS की याचिका खारिज

*

rajeshswari

नई दिल्ली (जनवार्ता) । मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 15 वर्षीय बलात्कार पीड़िता की 30-31 सप्ताह की अनचाही गर्भावस्था समाप्त करने के अपने पूर्व आदेश को बरकरार रखते हुए AIIMS की क्यूरेटिव याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि पीड़िता और उसके माता-पिता पर अनचाही प्रेग्नेंसी नहीं थोपी जा सकती।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान भावुक होते हुए कहा, “जरा सोचिए, यह 15 साल की बच्ची है… अभी उसे पढ़ाई करनी चाहिए, लेकिन हम उसे मां बनाना चाहते हैं। इस पूरी घटना में उस बच्ची ने कितना दर्द और कितनी बेइज्जती झेली होगी, कल्पना कीजिए।”

पीठ ने जोर देकर कहा कि अनचाही प्रेग्नेंसी किसी भी महिला पर थोपी नहीं जा सकती। यह बच्ची का रेप का मामला है। पीड़िता को जीवन भर मानसिक आघात और जख्म झेलने पड़ेंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अंतिम फैसला पीड़िता और उसके परिवार का होगा, जिसमें AIIMS जैसे मेडिकल विशेषज्ञ परिवार को विस्तृत काउंसलिंग और जोखिमों के बारे में जानकारी देकर मदद करेंगे।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी द्वारा AIIMS की रिपोर्ट के आधार पर याचिका पेश करने पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सख्त टिप्पणी की, “नागरिकों का सम्मान करिए मैडम। आपके पास कोर्ट के आदेश को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है। केवल पीड़िता या उसका परिवार ही इसे चुनौती दे सकता है।”

न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी कहा, “हम व्यक्तिगत पसंद का सम्मान करते हैं और आपको भी करना चाहिए।”

इसे भी पढ़े   चितईपुर: पुलिस ने तीन बाइक चोरों को चोरी की 9 मोटर साइकिलों के साथ किया गिरफ्तार

AIIMS की ओर से बताया गया कि इस स्टेज पर गर्भपात मेडिकल रूप से जोखिम भरा हो सकता है और नाबालिग मां को स्थायी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। साथ ही गोद लेने का विकल्प सुझाया गया। कोर्ट ने कहा कि अगर मां को कोई स्थायी विकलांगता नहीं होती तो गर्भपात पर विचार किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सख्ती से कहा कि बलात्कार पीड़िताओं के मामलों में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी कानून की 20 हफ्ते की सख्त समय सीमा को हटाया जाए। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की, “जब रेप की वजह से प्रेग्नेंसी होती है तो कोई समय सीमा नहीं होनी चाहिए। कानून को समय के साथ बदलना चाहिए, इसे लचीला और विकसित होते समय के अनुरूप बनाना चाहिए।”

कोर्ट ने 24 अप्रैल के अपने पूर्व आदेश का हवाला दिया, जिसमें जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने पहले ही 30 हफ्ते की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दे दी थी।

15 वर्षीय नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप वह 31 सप्ताह की गर्भवती हो गई। परिवार की याचिका पर कोर्ट ने पहले गर्भपात की इजाजत दी, लेकिन AIIMS ने मेडिकल चिंताओं का हवाला देते हुए क्यूरेटिव याचिका दायर की, जिसे आज खारिज कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट का मुख्य संदेश यह रहा कि पीड़िता की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और भविष्य को प्राथमिकता दी जाए। डॉक्टर परिवार को गाइड कर सकते हैं, लेकिन फैसला परिवार का ही होगा।

Shiv murti

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *