क्या कांग्रेस ने एससी-एसटी से छीनकर मुस्लिम कोटा दिया? पीएम मोदी के बयान…

क्या कांग्रेस ने एससी-एसटी से छीनकर मुस्लिम कोटा दिया? पीएम मोदी के बयान…
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नई दिल्ली। कांग्रेस यदि सत्ता में आती है तो वह लोगों की संपत्ति लेकर मुसलमानों को बांट देगी… पीएम मोदी के इस बयान पर कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दल सवाल खड़े कर ही रहे थे कि एक बार फिर उनकी ओर से मुस्लिम तुष्टीकरण का मुद्दा उठाया गया। इस पूरे विवाद के बीच प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार आरोप लगाया कि कांग्रेस लोगों का धन छीनकर अपने ‘खास’ लोगों को बांटने की गहरी साजिश रची है। मोदी ने कहा कि जब वह मुख्यमंत्री थे, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भाषण दिया था कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। उन्होंने कहा ये संयोग नहीं था। ये अकेला बयान नहीं था। कांग्रेस की सोच हमेशा से तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति की रही है। उन्होंने कहा कि 2004 में जैसे ही कांग्रेस की केंद्र में सरकार बनी उसके सबसे पहले किए गए कार्यों में से एक आंध्र प्रदेश में एससी-एसटी आरक्षण को कम कर मुसलमानों को आरक्षण देने का प्रयास था। मोदी ने कहा कि यह एक पायलट प्रोजेक्ट था जिसे कांग्रेस पूरे देश में आजमाना चाहती थी। प्रधानमंत्री की ओर से बार-बार कांग्रेस पर निशाना साधा जा रहा है आखिर मोदी किस ओर इशारा कर रहे हैं।

आंध्र प्रदेश से शुरुआत की हुई कोशिश
➤ आंध्र प्रदेश का जब बंटवारा नहीं हुआ था उसके पहले की बात है। यहां मुसलमानों के लिए आरक्षण पहली बार 1993-1994 में प्रस्तावित किया गया था। जब कोटला विजय भास्कर रेड्डी-कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय की स्थापना की थी। अगस्त 1994 में, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों और 14 अन्य जातियों को 5% कोटा प्रदान करने वाला एक सरकारी आदेश जारी किया गया था।

➤ यहां अगले दो चुनाव कांग्रेस हार जाती है। 2004 में कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए 5% कोटा को चुनावी वादा किया। वाई एस राजशेखर रेड्डी सीएम बने तो उन्होंने घोषणा की कि इसे दो महीने के भीतर लागू किया जाएगा। तब केंद्र में यूपीए की भी सरकार बन गई और इसे पूरा समर्थन दिया गया।

➤ मामला हाई कोर्ट पहुंच गया जहां कोर्ट ने सरकार से कोटा घटाकर 4% करने को कहा क्योंकि यह 50% की सीमा का उल्लंघन होगा। कांग्रेस की ओर से कहा गया कि कोटा धर्म के आधार पर नहीं पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया है।

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➤ तेलुगु देशम पार्टी और दूसरे दलों ने इसका विरोध किया। 2010 में एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 4% मुस्लिम कोटा के कार्यान्वयन पर रोक लगा दी, जबकि अगले आदेश तक आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग श्रेणी के तहत 14 श्रेणियों के लिए आरक्षण जारी रखने का आदेश दिया।

इटावा के छोटे से गांव सैफई से निकलकर अपनी मेहनत से समाजवादी राजनीति को सींचने वाले मुलायम सिंह यादव अब गोलोकवासी हो चुके हैं। देश के रक्षा मंत्री से लेकर यूपी के मुख्यमंत्री तक की कुर्सी संभालने वाले मुलायम परिवार की अगली पीढ़ी राजनीति में जड़ें मजबूत जमा चुकी हैं।

मैनपुरी की बहू और अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव को मैनपुरी लोकसभा से टिकट मिला है। मुलायम के निधन के बाद उपचुनाव में मैनपुरी जीतने वाली डिंपल एक बार फिर से चुनावी रण में उतर चुकी हैं। ससुर मुलायम के आशीर्वाद की बात करते हुए वह नामांकन कर चुकी हैं। उनका मुकाबला बीजेपी के ठाकुर जयवीर सिंह से है। डिंपल के सामने 28 साल से सपा के गढ़ को बचाने की चुनौती है।

मुलायम के भतीजे धर्मेंद्र यादव एक बार फिर से आजमगढ़ लोकसभा पर दांव आजमा रहे हैं। 2019 में यहां से अखिलेश यादव जीतकर आए थे। बाद में विधानसभा चुनाव जीतकर उन्होंने सीट छोड़ी तो उपचुनाव हुआ, जिसमें भाजपा के दिनेश लाल यादव निरहुआ सांसद बन गए। धर्मेंद्र यादव पिछली हार को भुलाकर इस बार फिर ताकत भिड़ा रहे हैं।

अखिलेश यादव ने अपने चचेरे भाई और रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव को उत्तर प्रदेश की फिरोजाबाद लोकसभा सीट से प्रत्याशी बनाया है। अक्षय यादव के खिलाफ भाजपा ने ठाकुर विश्वदीप सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। भाजपा ने अपने सिटिंग सांसद का टिकट काटकर ठाकुर विश्वदीप को फिरोजाबाद लोकसभा सीट का प्रत्याशी बनाया है। अक्षय पहले सांसद रह चुके हैं।

कन्नौज लोकसभा सीट से अखिलेश यादव ने अपने भतीजे और मुलायम के नाती तेज प्रताप यादव को टिकट दिया है। तेज प्रताप यादव के पिता रणवीर सिंह यादव का 36 साल की उम्र में ही निधन हो गया था। वह राजनीति में सक्रिय थे और ब्लॉक प्रमुख भी रहे। तेज की शादी बिहार के पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव की बेटी राजलक्ष्मी से हुई है। तेज का मुकाबला बीजेपी सांसद सुब्रत पाठक से है।

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इस लोकसभा चुनाव से शिवपाल यादव के बेटे आदित्य की भी सियासी एंट्री हो रही है। माथापच्ची के बाद बदायूं सीट से आदित्य यादव को टिकट मिला है। पहले यहां से धर्मेंद्र, फिर शिवपाल और फिर आदित्य का नाम फाइनल हुआ। बीजेपी से दुर्विजय सिंह शाक्य से उनका मुकाबला है।

सपा मुखिया अखिलेश यादव ने इस बार लोकसभा चुनाव में नहीं उतरने का फैसला किया है। 24 साल के राजनीतिक करियर में यह दूसरी बार है, जब वह लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। सपा के रणनीतिकारों का कहना है कि चुनाव प्रचार पर पूरी तरह फोकस करने के लिए अखिलेश ने खुद को उम्मीदवारी से दूर किया है। पहले उनके कन्नौज से लड़ने की चर्चा चल रही थी।

मुलायम के छोटे भाई शिवपाल यादव अभी जसवंतनगर सीट से विधायक हैं। उनके सांसदी लड़ने की चर्चा जोरों पर चल रही थी। लेकिन उन्होंने बदायूं लोकसभा सीट अपने बेटे आदित्य के लिए छोड़ दी। वह लोकसभा में समाजवादी पार्टी के प्रचार के साथ ही बदायूं से बेटे को जीत दिलाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव रिश्ते में मुलायम के चचेरे भाई लगते हैं। लेकिन शुरू से ही वह सपा के प्रोफेसर साहब रहे हैं। राज्यसभा में सांसद रामगोपाल के बेटे अक्षय इस बार चुनावी मैदान में हैं।

कांग्रेस के घोषणा पत्र में कब हुआ जिक्र
➤ 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से घोषणापत्र में नौकरियों और शिक्षा में मुसलमानों के लिए राष्ट्रव्यापी आरक्षण का वादा किया गया। 27% ओबीसी कोटा के भीतर एक मुस्लिम उप-कोटा बनाने का विचार था।

➤ कांग्रेस की ओर से कहा गया कि केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में अल्पसंख्यकों के लिए उनके सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर सरकारी रोजगार और शिक्षा में आरक्षण का बीड़ा उठाया है। हम इस नीति को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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➤ मिश्रा पैनल ने सरकारी नौकरियों और गैर-अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में मुसलमानों के लिए 10% और अन्य अल्पसंख्यकों के लिए 5% कोटा की सिफारिश की। वैकल्पिक मार्ग के रूप में इसने ओबीसी कोटा के भीतर एक उप-कोटा बनाने का सुझाव दिया।

यूपी में कांग्रेस की ओर से किया गया बड़ा प्रयोग
➤ यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में दो साल बाद साल 2011 में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय ने मिश्रा पैनल की रिपोर्ट के आधार पर, ओबीसी कोटा के भीतर 8.4% उप-कोटा का प्रस्ताव रखा, जिसमें मुसलमानों के लिए 6% शामिल था। बाद में मंडल आयोग के फॉर्मूले के आधार पर अल्पसंख्यकों के लिए इसे घटाकर 4.5% कर दिया गया।

➤उत्तर प्रदेश में 2012 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, यूपीए सरकार ने केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण में से अल्पसंख्यकों के लिए 4.5% उप-कोटा की घोषणा की।

बयान पर उठे सवाल
➤ चुनाव पूर्व कदम पर सवाल उठाया गया और चुनाव आयोग ने हस्तक्षेप किया और मनमोहन सिंह सरकार से यूपी सहित पांच राज्यों में चुनाव के अंत तक कोटा लागू नहीं करने को कहा।

➤ तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद, जिनके पास अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय का प्रभार भी था उनके बयान के बाद कि यदि पार्टी यूपी में जीतती है तो पिछड़े अल्पसंख्यकों को 9% आरक्षण देगी। चुनाव आयोग ने खुर्शीद को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर नहीं लगाई रोक
➤ मई 2012 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने यूपीए सरकार के 4.5% उप-कोटा कदम को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि इसे बनाने वाला कार्यालय ज्ञापन धार्मिक आधार पर था, न कि किसी अन्य विचार पर। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उसने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

बीजेपी ने 4 प्रतिशत आरक्षण को खत्म कर दिया
➤ मार्च 2023 में, कर्नाटक में विधानसभा चुनावों से पहले, राज्य की तत्कालीन बीजेपी सरकार ने पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत मुसलमानों को दिए गए 4% आरक्षण को खत्म कर दिया।


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