सुप्रीम कोर्ट का कड़ा निर्देश: रेप पीड़िता की पहचान छिपाने के नियम का सख्ती से पालन हो

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा निर्देश: रेप पीड़िता की पहचान छिपाने के नियम का सख्ती से पालन हो

नई दिल्ली (जनवार्ता) ।  सुप्रीम कोर्ट ने अदालती रिकॉर्ड में बलात्कार पीड़िताओं की पहचान उजागर होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को स्पष्ट निर्देश दिया कि आईपीसी की धारा 228-ए के तहत लगी रोक का सख्ती से पालन किया जाए। यह निर्देश उन सभी लंबित मामलों पर लागू होगा, चाहे वे 2018 के निपुण सक्सेना मामले के फैसले से पहले के हों।

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कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की पहचान उजागर करने से उन्हें अतिरिक्त मानसिक आघात पहुंचता है और ऐसे अपराधों की रिपोर्टिंग प्रभावित होती है। इसलिए, अदालती आदेशों, रिकॉर्ड और दस्तावेजों में पीड़िता का नाम, पता, परिवार या अन्य पहचान संबंधी विवरण पूर्ण रूप से छिपाए रखने चाहिए। उल्लंघन पर दो साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है।

यह निर्देश जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ द्वारा सुनाए गए एक महत्वपूर्ण फैसले के दौरान दिया गया। मामले में एक नाबालिग किशोरी से बलात्कार के आरोप में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी हुकुम चंद उर्फ मोनू को दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा सुनाई थी।

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया था, जिसमें उसने पीड़िता द्वारा दो घंटे में 16 किलोमीटर की यात्रा को असंभव बताते हुए अभियोजन पक्ष पर संदेह जताया था।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि वाला फैसला बहाल कर दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि समय-सीमा या गवाहों के बयानों में छोटी-मोटी विसंगतियों के आधार पर पूरे अभियोजन पक्ष को खारिज नहीं किया जा सकता। नाबालिग पीड़िता की गवाही को उच्च महत्व दिया जाना चाहिए।

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सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट को यह फैसला भेजने और इसका सख्त अनुपालन सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है।

यह फैसला पीड़िताओं की गरिमा और गोपनीयता की रक्षा के लिए कोर्ट की मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

Shiv murti

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