वाराणसी में मसाने की होली के भव्य आयोजन को अनुमति नहीं
निर्माण कार्यों के कारण सिर्फ कुछ लोगों को मिलेगी इजाजत
वाराणसी (जनवार्ता)। काशी की अनोखी और सदियों पुरानी परंपरा मसाने की होली (श्मशान में चिता की भस्म से खेली जाने वाली होली) इस बार विवादों और सुरक्षा चिंताओं के घेरे में है। मणिकर्णिका घाट पर 28 फरवरी (फाल्गुन शुक्ल द्वादशी) को प्रस्तावित इस आयोजन के लिए प्रशासन ने अभी तक पूर्ण अनुमति नहीं दी है, बल्कि निर्माण कार्यों और सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए इसे अत्यंत सीमित रूप में मनाने की सहमति जताई है।

एसीपी दशाश्वमेध डॉ. अतुल अंजान त्रिपाठी के अनुसार, मणिकर्णिका घाट पर वर्तमान में बड़े पैमाने पर निर्माण और खोदाई का कार्य चल रहा है। घाट क्षेत्र में जगह की कमी, नुकीले सरिये और अन्य खतरे मौजूद हैं, जिससे बड़ी भीड़ इकट्ठा करना जोखिमपूर्ण है। पुलिस ने नगर निगम के साथ समन्वय कर तय किया है कि इस बार केवल 15 से 20 लोगों (मुख्य रूप से अघोरी साधु और आयोजक) को ही भस्म से होली खेलने की अनुमति दी जाएगी। इससे परंपरा का निर्वहन तो हो सकेगा, लेकिन भीड़भाड़ और सुरक्षा संबंधी कोई समस्या नहीं आएगी।
आयोजकों का कहना है कि यह काशी की प्राचीन विशिष्ट परंपरा है, जिसकी मान्यता भगवान शिव से जुड़ी है। वे बताते हैं कि रंगभरी एकादशी के बाद भगवान शिव ने अपने गणों के साथ महाश्मशान में भस्म से होली खेली थी। इस बार भी करीब 50 क्विंटल चिता भस्म इकट्ठा की गई है और अघोरी साधु इसे आध्यात्मिक उत्सव के रूप में मनाने को तैयार हैं, जो जीवन-मृत्यु के चक्र और वैराग्य का प्रतीक है।
विपक्ष में काशी विद्वत परिषद, डोम राजा परिवार के वंशज विश्वनाथ चौधरी और अन्य संगठन खड़े हैं। उनका तर्क है कि यह परंपरा किसी प्रमुख पुराण या शास्त्र में स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं है। श्मशान को शोक और अंतिम संस्कार का पवित्र स्थान मानते हुए वे कहते हैं कि यहां नाच-गाना या हुड़दंग शोभनीय नहीं। डोम राजा ने प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर आयोजन पर पूर्ण रोक की मांग की है और चेतावनी दी है कि अनुमति मिलने पर दाह संस्कार प्रभावित हो सकता है।
कुछ धर्माचार्य और बुद्धिजीवी बीच का रास्ता सुझा रहे हैं, जिसमें सीमित संख्या में, मर्यादा बनाए रखते हुए परंपरा निभाई जाए। प्रशासन सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए अंतिम फैसला लेगा, लेकिन वर्तमान स्थिति से स्पष्ट है कि इस बार यह उत्सव अपनी पुरानी भव्यता में नहीं, बल्कि बहुत नियंत्रित और सीमित रूप में मनाया जाएगा। 28 फरवरी को स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाएगी। शहर में चर्चा जारी है कि क्या यह अनोखी परंपरा भविष्य में अपनी मूल गरिमा वापस पा पाएगी।

