मशीनों का जाल: बच्चों की टूटती मानसिक दुनिया
ममता आनंद
गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों—निशिका, प्राची और पाखी—का एक साथ आत्महत्या करना केवल एक पारिवारिक त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे दौर की डिजिटल-मानसिक आपदा का भयावह संकेत है। यह क्षणिक आवेश का परिणाम नहीं लगता, अपितु लंबे समय से चली आ रही मानसिक कंडीशनिंग की उपज है, जिसे अब अनदेखा करना घातक होगा।दक्षिण कोरिया से प्रेरित टास्क-आधारित ऑनलाइन गेम्स और डिजिटल चुनौतियाँ बच्चों को ‘टास्क’, ‘लेवल’ और ‘कम्पलीशन’ की सुनियोजित जंजीरों में जकड़ लेती हैं। प्रारंभ में ये सामान्य रूटीन प्रतीत होते हैं, किंतु धीरे-धीरे भय, अपराधबोध और गोपनीयता के दबाव से बच्चों की सोच पर कब्जा कर लेते हैं। असफलता पर दंड और ‘अंतिम स्तर’ जैसी अवधारणाएँ उन्हें वास्तविक जीवन से विमुख कर देती हैं। समस्या यह नहीं कि बच्चे गेम खेलते हैं, बल्कि वे जीवन को ही गेम मानने लगे हैं—जहाँ ‘एग्जिट’ एक विकल्प बन जाता है।किशोरावस्था स्वाभाविक रूप से भावनात्मक अस्थिरता और आत्मसंशय का काल है। लड़कियों पर सामाजिक अपेक्षाएँ, प्रदर्शन का दबाव और शारीरिक छवि की चिंता अतिरिक्त बोझ डालती हैं। ऐसे में ये गेम्स झूठा नियंत्रण और अपनापन प्रदान करते हैं, जो अंततः मानसिक गुलामी में परिवर्तित हो जाते हैं।


*मॉनिटरिंग और सरकारी भूमिका : तात्कालिक कदमआज के माहौल में इस खतरे की निगरानी कैसे हो? सरकार को इसे मात्र ‘साइबर अपराध’ न मानकर मानसिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करना होगा।टास्क-आधारित और आत्मघाती संकेतों वाले गेम्स पर सख्त नियमन लागू करें।सभी स्कूलों में एआई-आधारित डिजिटल व्यवहार निगरानी प्रणाली स्थापित करें।सोशल मीडिया व गेमिंग प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही निश्चित करें।प्रत्येक जिले में बाल डिजिटल सुरक्षा केंद्र अनिवार्य करें, जहाँ लतग्रस्त बच्चों की काउंसलिंग से आदत सुधारें।स्कूल अंक-उत्पादक केंद्र न रहें, अपितु मानसिक साक्षरता के केंद्र बनें। पाठ्यक्रम में डिजिटल नीति और मानसिक स्वास्थ्य शामिल करें; शिक्षकों को मनोवैज्ञानिक लक्षण पहचानने का प्रशिक्षण दें। अभिभावक निगरानी के बजाय संवाद और विश्वास का वातावरण बनाएँ। मोबाइल छीनना पर्याप्त नहीं—बच्चों से नियमित बातचीत, उनके ऑनलाइन व्यवहार की समझ और भावनात्मक परिवर्तनों पर सजगता आवश्यक है। जैसे अचानक चुप्पी, नींद की कमी या सामाजिक अलगाव को ‘उम्र का प्रभाव’ न बताकर संबोधित करें। शिक्षक कक्षा में पाठ्य सामग्री के साथ मानसिक पर्यवेक्षक भी हों, ताकि तनाव, एकाकीपन या आक्रामकता के संकेत समय रहते काउंसलिंग तक पहुँचें। शिक्षक-अभिभावक संवाद ही बच्चों को डिजिटल जाल से बचा सकता है।
तीन बहनों की मृत्यु एक कठोर प्रश्न छोड़ जाती है—क्या हम बच्चों को सुरक्षित भविष्य दे रहे हैं, या मात्र भयावह स्क्रीन थमाकर माता-पिता की जिम्मेदारी निभा रहे हैं? यदि हमने डिजिटल दुनिया को मानवीय संवेदनशीलता से नियंत्रित न किया, तो ऐसी घटनाएँ अपवाद न रहकर सामाजिक विफलता बन जाएँगी, और देश की नींव संस्कार-कुपोषित होती चली जाएगी।
(लेखिका वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी है)

