बीएचयू में प्राचीन मानव इतिहास पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू
प्राचीन डीएनए और जनसंख्या जीनोमिक्स पर विशेषज्ञों ने की चर्चा
वाराणसी (जनवार्ता)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जन्तु विज्ञान विभाग में सोमवार को ‘पेलियोजीनोमिक्स एवं पेलियोआर्कियोलॉजी’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ। यह आयोजन भारत के प्राचीन मानव इतिहास को समझने, प्राचीन डीएनए (एंशिएंट डीएनए) अध्ययन को बढ़ावा देने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है। संगोष्ठी का सह-आयोजन मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण भारत के साथ किया जा रहा है।

कार्यक्रम की शुरुआत महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन और कुलगीत से हुई। जन्तु विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. मुनीयंदी सिंगारवेल ने स्वागत भाषण में विभाग की 105 वर्ष पुरानी विरासत, जेनेटिक्स, साइटोजेनेटिक्स और विकासवादी जीवविज्ञान में योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने विभाग के प्रसिद्ध पूर्व छात्रों जैसे डॉ. लालजी सिंह, डॉ. कानूनगो आदि का स्मरण किया।
विज्ञान संस्थान के डीन प्रो. आर. के. श्रीवास्तव ने कहा कि डीएनए मूल रूप से प्राणिविज्ञान का हिस्सा है और यह सहयोग भारतीय वंशावली तथा अन्य क्षेत्रों की आबादी के बीच संबंधों को स्पष्ट करेगा। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. संजय मंजुल ने शोध में पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। आईएसएल भुवनेश्वर के निदेशक डॉ. देबासीस दास और प्रो. एस.सी. लखोटिया ने भी इस पहल की सराहना की।
प्रथम सत्र में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के पूर्व मानवशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. एस. आर. वालिम्बे ने महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि पिछले 10,000 वर्षों (होलोसीन काल से अब तक) में भारत में बड़े पैमाने पर कोई मानव प्रवास या बाहरी आगमन नहीं हुआ। न तो बड़े आक्रमण हुए और न ही लाखों-करोड़ों लोगों का सामूहिक स्थानांतरण दर्ज किया गया। केवल व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान या सीमित व्यक्तिगत/समूह स्तर के छोटे प्रवास ही हुए।
प्रो. वालिम्बे ने मानवशास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर बताया कि हड़प्पा काल (लगभग 4500-1900 ईसा पूर्व) से लेकर बाद के कालों में उत्तर-पश्चिम भारत से दक्षिण तक शारीरिक विशेषताओं में क्रमिक निरंतरता बनी रही। उनका निष्कर्ष है कि भारत की जनसंख्या में स्थानीय विकास और अनुकूलन प्रमुख रहा, जबकि बाहरी प्रभाव सीमित और मुख्यतः सांस्कृतिक स्तर पर रहे।
संगोष्ठी में प्रो. राजीव रमन, डॉ. बी.पी. उराडे (उप निदेशक, मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण भारत) सहित कई विशेषज्ञों ने भाग लिया। धन्यवाद ज्ञापन में प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे को मुख्य समन्वयक के रूप में विशेष आभार व्यक्त किया गया।
यह संगोष्ठी प्राचीन मानव इतिहास की समझ को गहरा करने के साथ-साथ भविष्य में अनुसंधान के लिए मजबूत आधार तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। दूसरे दिन भी विभिन्न सत्रों में प्राचीन डीएनए, गट माइक्रोबायोम और जनसंख्या जीनोमिक्स पर गहन चर्चा होगी।

