500 साल पुरानी परंपरा का जीवंत उत्सव: 13 दिन बाद संपन्न हुआ रम्माण, UNESCO से मिली वैश्विक पहचान

500 साल पुरानी परंपरा का जीवंत उत्सव: 13 दिन बाद संपन्न हुआ रम्माण, UNESCO से मिली वैश्विक पहचान

18 मुखौटों और तालों के जरिए पूरी रामकथा का मंचन, उत्तराखंड के चमोली में अनूठी सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन

चमोली:
गढ़वाल हिमालय की समृद्ध लोक परंपराओं का प्रतीक रम्माण उत्सव इस वर्ष 13 दिनों तक चलने के बाद संपन्न हो गया। उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूर-डुंगरा गांव में आयोजित यह उत्सव 14 अप्रैल से 26 अप्रैल तक चला, जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

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करीब 500 वर्ष पुरानी इस परंपरा में धार्मिक अनुष्ठान, लोकनृत्य, गीत और नाट्य प्रस्तुतियों के माध्यम से क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत किया जाता है। रम्माण की सबसे खास विशेषता इसका मुखौटा नृत्य है, जिसमें 18 मुखौटों और 18 तालों के जरिए संपूर्ण रामकथा का संक्षिप्त मंचन किया जाता है।


यह अनूठा उत्सव वर्ष 2009 में UNESCO द्वारा अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता प्राप्त कर चुका है। इसे राज्य का एकमात्र पारंपरिक उत्सव माना जाता है, जिसे यह वैश्विक सम्मान मिला है।
रम्माण उत्सव का केंद्र जोशीमठ क्षेत्र है, जिसे देवभूमि के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक रूप से यह स्थान आदि शंकराचार्य से जुड़ा है, जिन्होंने 8वीं शताब्दी में यहां ज्योतिर्मठ की स्थापना कर सनातन परंपराओं को सशक्त किया था।


उत्सव का आयोजन सलूर-डुंगरा, बरोशी और सेलंग गांवों की संयुक्त पंचायतों द्वारा किया जाता है। 11 से 13 दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में पूजा-अनुष्ठान, देवयात्रा, लोकनाट्य, नृत्य और मेले जैसे कार्यक्रम शामिल होते हैं।


रम्माण केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। इसमें विभिन्न वर्गों और जातियों के लोग अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ भाग लेते हैं। नृत्य के दौरान कुरूजोगी, बण्यां और माल जैसे पात्र हास्य और सामाजिक संदेशों के माध्यम से दर्शकों को आकर्षित करते हैं।
स्थानीय लोगों की पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी आस्था और उत्साह के साथ निभाई जा रही है, जो इसे भारतीय सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल हिस्सा बनाती है।

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Shiv murti

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