रूस-चीन गैस डील से भारत को राहत की उम्मीद

रूस-चीन गैस डील से भारत को राहत की उम्मीद

‘पावर ऑफ साइबेरिया-2’ पाइपलाइन से वैश्विक LNG बाजार में आ सकती है बड़ी गिरावट

बीजिंग। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस और चीन के बीच प्रस्तावित ‘पावर ऑफ साइबेरिया-2’ गैस पाइपलाइन परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। रूसी राष्ट्रपति Vladimir Putin और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच इस परियोजना को लेकर जारी बातचीत को वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह डील अंतिम रूप लेती है तो इसका असर भारत समेत कई एशियाई देशों में पेट्रोल, डीजल और CNG की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
‘पावर ऑफ साइबेरिया-2’ परियोजना करीब 2600 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन है, जिसके जरिए रूस के साइबेरियाई क्षेत्र से प्राकृतिक गैस मंगोलिया के रास्ते चीन पहुंचाई जाएगी। पाइपलाइन की प्रस्तावित क्षमता सालाना 50 अरब घन मीटर (bcm) गैस सप्लाई की बताई जा रही है। इसे रूस के लिए यूरोपीय बाजार के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के चलते रूस का यूरोपीय गैस बाजार काफी सीमित हो गया है। ऐसे में रूस अब एशियाई बाजार, विशेषकर चीन, पर अपनी निर्भरता बढ़ाना चाहता है।
विशेषज्ञों के अनुसार चीन फिलहाल अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा कतर और ऑस्ट्रेलिया से समुद्री मार्ग के जरिए आयातित LNG से पूरा करता है। यदि रूस से पाइपलाइन के जरिए बड़ी मात्रा में गैस मिलने लगती है तो चीन अंतरराष्ट्रीय LNG बाजार से खरीद कम कर सकता है।
ऐसी स्थिति में वैश्विक बाजार में LNG और कच्चे तेल की मांग घट सकती है, जिससे कीमतों में नरमी आने की संभावना बनेगी। इसका फायदा भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे आयातक देशों को मिल सकता है। भारत के लिए सस्ती गैस उपलब्ध होने पर CNG, PNG और ईंधन कीमतों में राहत की संभावना जताई जा रही है।
हालांकि परियोजना पर रूस और चीन के बीच अब भी कई मुद्दों पर सहमति बनना बाकी है। रूस चाहता है कि गैस की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप तय हो, जबकि चीन कम दरों पर दीर्घकालिक आपूर्ति चाहता है।
इसके अलावा रूस चीन से हर साल तय मात्रा में गैस खरीद की गारंटी मांग रहा है, लेकिन चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कई विकल्प खुले रखना चाहता है। चीन पहले से ‘पावर ऑफ साइबेरिया-1’ पाइपलाइन से गैस प्राप्त कर रहा है। इसके अलावा उसे मध्य एशियाई देशों, म्यांमार और समुद्री LNG सप्लाई से भी गैस मिल रही है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के पास पर्याप्त विकल्प मौजूद होने के कारण वह इस समझौते में जल्दबाजी के मूड में नहीं है, जबकि रूस के लिए यह परियोजना रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

rajeshswari
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Shiv murti

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