डोमराजा परिवार ने की ‘मसाने की होली’ पर रोक लगाने की मांग
वाराणसी : काशी के प्रसिद्ध महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर ‘मसाने की होली’ या ‘चिता भस्म की होली’ को लेकर इस साल (2026) तीव्र विवाद खड़ा हो गया है। डोमराजा परिवार ने पहली बार खुलकर विरोध जताया है और जिला प्रशासन से इस आयोजन को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग की है।

डोमराजा विश्वनाथ चौधरी ने हाल ही में जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपते हुए कहा कि यह कोई प्राचीन या पारंपरिक रिवाज नहीं है। उन्होंने दावा किया कि यह आयोजन लगभग 2009 के आसपास शुरू हुआ और अब इवेंट की शक्ल ले चुका है, जिसमें शराब पीना, हुड़दंग मचाना, नाच-गाना और शवों के साथ सेल्फी लेने जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। घाट पर शव लेकर आए दुखी परिजनों की भावनाओं का गहरा अपमान होता है, अंतिम संस्कार में बाधा पड़ती है और महिलाओं-युवतियों का श्मशान में प्रवेश शास्त्रों के विरुद्ध माना जाता है।
ज्ञापन में विश्वनाथ चौधरी ने लिखा है, “यह कार्यक्रम अब मसाननाथ मंदिर के बाहर तक फैल चुका है। नशे की हालत में अभद्रता, शवों के साथ रील बनाना, नाबालिगों की मौजूदगी जैसी घटनाएं होती हैं। यह पूरी तरह अनैतिक, अधार्मिक और श्मशान की पवित्रता के खिलाफ है।” उन्होंने मांग की कि ऐसे उपद्रवी आयोजनों को अनुमति न दी जाए और प्रशासन सख्त कार्रवाई करे।
डोमराजा परिवार का स्पष्ट कहना है कि सदियों से दाह-संस्कार संभालने वाले उनके पूर्वजों ने कभी चिता भस्म से होली नहीं खेली। यदि होली खेलनी है तो रंगभरी एकादशी (27 फरवरी) पर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में जाकर खेलें, मसान में नहीं।
इस विरोध में काशी विद्वत परिषद, सनातन रक्षक दल और अन्य संगठन भी शामिल हैं। वे इसे अशास्त्रीय बताते हुए कहते हैं कि श्मशान मोक्ष की भूमि है, उत्सव या तमाशे की जगह नहीं। विद्वत परिषद के अनुसार, यह हाल के वर्षों का चलन है, जिसे इवेंट मैनेजमेंट की तरह बढ़ावा दिया जा रहा है।
आयोजक पक्ष इसे प्राचीन परंपरा बताकर बचाव कर रहा है और दावा करता है कि भगवान शिव स्वयं भस्म से होली खेलते हैं। लेकिन विरोधी तर्क देते हैं कि इसका वर्तमान रूप विकृत हो चुका है और श्मशान की मर्यादा भंग कर रहा है।

