अजय राय : प्रदेश अध्यक्ष पद से आगे की राजनीति, अब अगली भूमिका पर सबकी नजर
■ संघर्ष की राजनीति से संगठन के शिखर तक का सफर
(डॉ राज कुमार सिंह)
वाराणसी (जनवार्ता)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अजय राय उन नेताओं में गिने जाते हैं, जिन्होंने पद या चुनावी जीत से अधिक अपने लंबे संघर्ष, जमीनी संपर्क और संगठनात्मक सक्रियता से पहचान बनाई। छात्र जीवन से राजनीति में सक्रिय रहे अजय राय ने अपने बड़े भाई अवधेश राय की हत्या के बाद कठिन परिस्थितियों में चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। उसे समय के राजनीतिक दिग्गज उदल को हराकर 1996 में भाजपा के टिकट पर कोलसला विधानसभा सीट जीती और 2002 व 2007 में भी विजय हासिल की। 2009 के उपचुनाव मायावती की सरकार रहते निर्दल जीते तथा 2012 में पिंडरा सीट से भी वे विधायक चुने गए।

भाजपा से कांग्रेस तक
भाजपा से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर बाद में कांग्रेस तक पहुंचा। अगस्त 2023 में उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। यह जिम्मेदारी ऐसे समय मिली, जब पार्टी को प्रदेश में संगठन मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की चुनौती थी।
2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया और उत्तर प्रदेश में छह सीटें जीतीं। वाराणसी से अजय राय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार तीसरी बार चुनाव लड़ा। उन्हें 4,60,457 वोट मिले, जबकि नरेंद्र मोदी को 6,12,970 वोट प्राप्त हुए। जीत का अंतर 1,52,513 रहा।
2019 में वाराणसी में जीत का अंतर 4.79 लाख से अधिक था और अजय राय तीसरे स्थान पर रहे थे। 2024 में वे दूसरे स्थान पर पहुंचे। इसे वाराणसी में कांग्रेस की वापसी और अजय राय की बढ़ती स्वीकार्यता का संकेत माना गया।अजय राय जैसे सशक्त नेता को अपनी तरफ करने के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक ने पिछले चुनाव में जोर लगाया लेकिन अजय राय डिगे नहीं। वह मजबूती से कांग्रेस के साथ खड़े रहे और चुनाव लड़े।
संघर्ष और सड़क की राजनीति
अजय राय की पहचान आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और सड़क की राजनीति में सक्रिय भागीदारी से बनी है। वे केवल बयान देने के बजाय कार्यकर्ताओं और जनता के बीच उतरकर संघर्ष करने वाले नेता माने जाते हैं। उनके समर्थक उनकी बेबाकी, साहस और दबाव में भी मजबूती से खड़े रहने की क्षमता को उनकी सबसे बड़ी ताकत बताते हैं। सत्ता के खिलाफ संघर्ष करते हुए वह कई बार जेल भी गये।
वाराणसी की स्थानीय राजनीति से लेकर प्रदेश संगठन तक उनकी सक्रियता ने उन्हें कार्यकर्ता-केंद्रित नेता की छवि दी। वे कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद और सहज उपलब्धता के लिए भी पहचाने जाते हैं।
संगठन को मजबूत करने का प्रयास
प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अजय राय ने जिला, विधानसभा और ब्लॉक स्तर तक संगठन को सक्रिय करने पर जोर दिया। स्थानीय मुद्दों को उठाने, कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारने और कांग्रेस की मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की गई। 2024 में पार्टी की छह सीटों पर जीत को इसी प्रयास के संदर्भ में भी देखा गया। संगठन को सक्रिय रखने और कार्यकर्ताओं में ऊर्जा भरने में अजय राय का योगदान महत्वपूर्ण रहा।
2027 से पहले बदलाव
2 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश संगठन में बदलाव करते हुए अजय राय की जगह तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष तथा देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया।
इस बदलाव को 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की रणनीति माना जा रहा है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष पद से हटना अजय राय की राजनीतिक भूमिका का अंत नहीं है। उनका जमीनी अनुभव, पूर्वांचल में पकड़ और कार्यकर्ताओं के बीच नेटवर्क अब भी उनकी बड़ी राजनीतिक पूंजी है।
वाराणसी से प्रदेश तक
वाराणसी और पूर्वांचल अजय राय का मजबूत आधार रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उन्होंने 2014, 2019 और 2024 में लोकसभा चुनाव लड़ा।उन्हें जीत न मिलने के बावजूद 2024 में उनके मतों में बड़ी वृद्धि हुई, जो उनके बढ़ते जनाधार और लगातार मेहनत का संकेत मानी गई।
अजय राय कांग्रेस आला कमान सोनिया गांधी,राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के विश्वास पर खरे उतरने वाले नेता हैं। प्रदेश नेतृत्व में बदलाव के बाद उनकी अगली भूमिका पर चर्चा स्वाभाविक है, लेकिन किसी आधिकारिक घोषणा के बिना अटकलों को तथ्य मानना उचित नहीं होगा। अजय राय की यात्रा संघर्ष, साहस, चुनावी चुनौती और संगठन निर्माण की कहानी है। पद बदल सकता है, पर उत्तर प्रदेश कांग्रेस में उनका प्रभाव और संघर्षशील पहचान कायम रहने की संभावना है।

