काशी में पर्यटक बढ़ें, लेकिन काशीवासियों के रास्ते बंद न हों

काशी में पर्यटक बढ़ें, लेकिन काशीवासियों के रास्ते बंद न हों

श्रद्धालुओं की सुविधा के साथ स्थानीय नागरिकों के आवागमन का भी ध्यान रखे प्रशासन, यातायात प्रयोगों से बढ़ रही परेशानी

rajeshswari

(डा राज कुमार सिंह)

काशी आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के स्वागत में यदि काशीवासियों के ही रास्ते बंद होने लगें तो क्या यह व्यवस्था वास्तव में काशी के हित में कही जा सकती है?


भगवान शिव की नगरी काशी सदियों से अतिथि देवो भवः की परंपरा का निर्वहन करती आई है। देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों का स्वागत करना यहां की संस्कृति और स्वभाव दोनों में शामिल है। काशीवासियों को इस बात पर गर्व है कि उनकी नगरी विश्व के प्रमुख आध्यात्मिक और पर्यटन केंद्रों में शामिल हो रही है। लेकिन पर्यटन के बढ़ते दबाव के बीच एक सवाल अब गंभीरता से उठने लगा है-क्या काशी को सुविधाजनक पर्यटन नगरी बनाने की कोशिश में काशीवासियों के सहज जीवन और आवागमन की कीमत तो नहीं चुकाई जा रही?

गिरजाघर चौराहा :पैदल के लिए भी हुआ वनवे।


इन दिनों दशाश्वमेध से लेकर चौक और आसपास के क्षेत्रों में यातायात व्यवस्था में लगातार बदलाव किए जा रहे हैं। कहीं बैरिकेडिंग कर रास्ते बंद हैं, कहीं मार्ग को एकतरफा किया जा रहा है तो कहीं गलियों में वाहनों का प्रवेश रोक दिया जाता है। कई स्थानों पर दोपहिया वाहनों को भी आगे जाने की अनुमति नहीं मिल रही है। परिणाम यह है कि जिन लोगों का घर, दुकान, कार्यालय या परिचित इसी क्षेत्र में है, उन्हें छोटी दूरी तय करने के लिए कई किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ रहा है।


महंगाई के इस दौर में यह केवल समय की बर्बादी नहीं है। अतिरिक्त दूरी का अर्थ है अतिरिक्त ईंधन खर्च, अधिक यातायात दबाव और रोजमर्रा के काम में अनावश्यक देरी। सबसे बड़ी समस्या तब उत्पन्न होती है जब किसी व्यक्ति को अचानक चिकित्सकीय, पारिवारिक या व्यावसायिक आवश्यकता से इन क्षेत्रों में पहुंचना हो।


गिरजाघर चौराहे और दशाश्वमेध थाने के सामने से चौक की ओर जाने वाले रास्तों पर वाहनों के आवागमन को लेकर लगाए जा रहे प्रतिबंध इसका उदाहरण हैं। स्थानीय नागरिकों के साथ-साथ पैदल आने-जाने वालों को भी कई बार अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। यदि किसी व्यक्ति को चौक की ओर जाना है तो उसे निर्धारित मार्ग से घूमकर आगे बढ़ना पड़ता है। दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए की गई व्यवस्था में स्थानीय लोगों की जरूरतों के लिए अलग विकल्प नहीं होने से परेशानी स्वाभाविक है।

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दशाश्वमेध थाने से कोदई चौकी गली के रास्ते में नीचे से बैरिकेट कर रास्ता रोकने का प्रयास।


दालमंडी क्षेत्र की स्थिति अलग चुनौती पेश कर रही है। सड़क चौड़ीकरण के लिए ध्वस्तीकरण का कार्य चल रहा है। निर्माण और ध्वस्तीकरण के कारण पहले ही आवागमन प्रभावित है। ऐसे में यातायात प्रबंधन में किए जा रहे नए-नए बदलाव स्थानीय लोगों की परेशानी और बढ़ा रहे हैं। विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन विकास के दौरान नागरिकों को न्यूनतम असुविधा हो, इसकी जिम्मेदारी भी व्यवस्था की ही है।

दालमंडी गली का पहले ही है यह हाल।


सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यातायात प्रबंधन की प्रक्रिया को लेकर है। किसी दिन अचानक मार्ग बदल दिया जाता है, किसी दिन नो-व्हीकल जोन बना दिया जाता है और कई बार स्थानीय नागरिकों को इसकी जानकारी मौके पर पहुंचने के बाद होती है। आधुनिक सूचना तकनीक के दौर में ऐसा नहीं होना चाहिए। किसी प्रमुख मार्ग पर यातायात व्यवस्था में बदलाव प्रस्तावित है तो उसकी सूचना पहले से समाचार पत्रों, सोशल मीडिया, स्थानीय डिजिटल मीडिया, यातायात पुलिस के आधिकारिक माध्यमों और अन्य सार्वजनिक सूचना माध्यमों से दी जा सकती है।


इससे नागरिक वैकल्पिक मार्ग चुन सकेंगे और अनावश्यक जाम तथा भ्रम दोनों से बचा जा सकेगा।


यह भी समझना होगा कि काशी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है। यह एक जीवंत शहर है। यहां लोग रहते हैं, काम करते हैं, दुकानें चलाते हैं, बच्चे स्कूल जाते हैं, कर्मचारी अपने कार्यालय जाते हैं और परिवार रोजमर्रा की जरूरतों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते-जाते हैं। मंदिर, घाट और पर्यटन क्षेत्र इस शहर की पहचान हैं, लेकिन उनके आसपास रहने वाले नागरिक भी काशी की आत्मा का अभिन्न हिस्सा हैं।


बाबा विश्वनाथ मंदिर क्षेत्र इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मंदिर परिक्षेत्र के आसपास बड़ी आबादी रहती है और हजारों व्यापारिक प्रतिष्ठान संचालित होते हैं। वर्षों की मांग के बाद स्थानीय लोगों के लिए अलग दर्शन मार्ग की व्यवस्था की गई, जो स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन मंदिर क्षेत्र के आसपास रहने वाले लोगों की दैनिक आवाजाही की समस्या अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। स्थानीय निवासी यदि अपने घर से मंदिर, दुकान या किसी आवश्यक कार्य के लिए निकलता है तो उसे भी कई बार वही प्रतिबंध झेलने पड़ते हैं, जो सामान्य रूप से भारी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगाए जाते हैं।

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क्या स्थानीय निवासियों के लिए कोई ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती जिसमें सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण के साथ उनकी आवश्यक आवाजाही भी सुनिश्चित हो?


कई पर्यटन प्रधान शहरों ने इस समस्या का समाधान स्थानीय नागरिकों और पर्यटकों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाओं के माध्यम से किया है। वाराणसी में भी इसी दिशा में गंभीरता से विचार किया जा सकता है। मंदिर और प्रमुख पर्यटन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले स्थानीय नागरिकों के लिए डिजिटल या स्थानीय पहचान आधारित सीमित प्रवेश व्यवस्था बनाई जा सकती है। निर्धारित समय में दोपहिया वाहनों के नियंत्रित आवागमन की अनुमति दी जा सकती है। बुजुर्गों, मरीजों और आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोगों के लिए अलग व्यवस्था हो सकती है।


सबसे जरूरी है कि प्रशासन यातायात व्यवस्था को केवल मौके की भीड़ के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय जनजीवन को ध्यान में रखकर तैयार करे।


यहां एक और सवाल जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी है। काशी के नागरिकों की समस्याओं को शासन और प्रशासन तक पहुंचाना जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। पर्यटन और विकास के बड़े मुद्दों के बीच स्थानीय नागरिकों की रोजमर्रा की परेशानियां कहीं दब न जाएं, इसका ध्यान रखना भी आवश्यक है। काशी की जनता लंबे समय से विकास परियोजनाओं और पर्यटन सुविधाओं में सहयोग करती रही है। उसने अपने घर, दुकान, सड़क और गलियों में होने वाले बदलावों को स्वीकार किया है। इसलिए उसकी अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि व्यवस्था उसके जीवन को पूरी तरह नजरअंदाज न करे।


काशीवासी मेहमानों से शिकायत नहीं करते। वे चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग काशी आएं, बाबा विश्वनाथ के दर्शन करें, गंगा आरती देखें और काशी की आध्यात्मिक विरासत से परिचित हों। लेकिन अतिथि देवो भवः का अर्थ यह नहीं हो सकता कि मेजबान ही अपने घर में असुविधा का सामना करता रहे।

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काशी को विश्वस्तरीय पर्यटन नगरी बनाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ उसे रहने योग्य और चलने-फिरने में सहज शहर बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। पर्यटन की सफलता तभी सार्थक होगी जब बाहर से आने वाला व्यक्ति भी सुविधा महसूस करे और स्थानीय नागरिक भी अपने शहर में सहजता से जीवन जी सके।


प्रशासन को यातायात व्यवस्था के प्रत्येक प्रयोग से पहले उसके प्रभाव का आकलन करना चाहिए। स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों, मंदिर क्षेत्र से जुड़े लोगों और यातायात विशेषज्ञों से संवाद कर व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। किसी मार्ग को डायवर्ट करने या नो-व्हीकल जोन घोषित करने से पहले स्पष्ट सूचना सार्वजनिक की जानी चाहिए। आपातकालीन सेवाओं के लिए निर्बाध रास्ते सुनिश्चित किए जाने चाहिए और स्थानीय नागरिकों के लिए व्यावहारिक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराए जाने चाहिए।


काशी की पहचान केवल उसके मंदिरों और घाटों से नहीं है। काशी की पहचान उसके लोगों से भी है-उन गलियों में पीढ़ियों से रहते परिवारों से, उन दुकानों से जहां वर्षों से कारोबार होता आया है और उन नागरिकों से जिन्होंने हर दौर में इस शहर को अपना घर बनाए रखा है।


इसलिए जरूरत पर्यटन और स्थानीय जीवन के बीच चुनाव करने की नहीं, बल्कि दोनों के बीच संतुलन बनाने की है।
काशी में श्रद्धालु आएं, पर्यटक आएं, दुनिया काशी की आध्यात्मिक भव्यता देखे-लेकिन काशीवासी अपने ही शहर में रास्ता खोजते न फिरें।


काशी के घाट खुले रहें, गंगा तक पहुंच बनी रहे, बाबा विश्वनाथ के दरबार तक भक्त पहुंचें और साथ ही काशीवासियों के घर, दुकान और जीवन की राह भी खुली रहे।यही विकास का संतुलित मॉडल होगा और यही उस काशी की गरिमा के अनुरूप होगा, जो सदियों से दुनिया को अपनाती आई है।

(लेखक “जनवार्ता” के सम्पादक हैं)

Shiv murti

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