उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ाने खेतों में उतरे वैज्ञानिक

उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ाने खेतों में उतरे वैज्ञानिक

आईआईवीआर की 8 टीमें गांवों में दे रहीं जैव-उर्वरक किट व लाइव डेमो

वाराणसी  (जनवार्ता)। रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से बिगड़ती मिट्टी की सेहत और बढ़ती खेती लागत को देखते हुए भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (आईआईवीआर) ने पूर्वांचल के गांवों में विशेष जागरूकता अभियान शुरू किया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रव्यापी अभियान के तहत आईआईवीआर की आठ वैज्ञानिक टीमें गांव-गांव पहुंचकर किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए प्रेरित कर रही हैं। यह अभियान 30 जून तक चलेगा।

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वैज्ञानिक खेतों और चौपालों पर शिविर लगाकर किसानों को सूक्ष्मजीव आधारित जैव-उर्वरकों के उपयोग, मृदा स्वास्थ्य और रासायनिक उर्वरकों की कम खपत के फायदे समझा रहे हैं। अब तक 2500 से अधिक किसानों तक पहुंच बनाई जा चुकी है। किसानों को जैव-उर्वरक किट, मृदा स्वास्थ्य संबंधी पर्चे तथा खेतों में लाइव डेमो भी दिए जा रहे हैं।

प्रधान वैज्ञानिक डॉ. डी.पी. सिंह ने बताया कि देश में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश का आदर्श अनुपात 4:2:1 होना चाहिए, जबकि वर्तमान राष्ट्रीय औसत 9.3:3.5:1 तक पहुंच गया है। इससे मिट्टी की उर्वरता और जैविक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि सूक्ष्मजीव जैव-उर्वरकों के उपयोग से किसान रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता 25 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं, जिससे उत्पादन लागत घटेगी और सरकारी उर्वरक अनुदान का बोझ भी कम होगा।

शिविरों में किसानों को काशी एज़ोबीसी, फोस्फोमिक्स, पोटामैक्स, नाइट्रोफिक्स तथा जिंक-एक्टिव जैसे जैव-उर्वरक उत्पाद वितरित किए जा रहे हैं। साथ ही काशी बायोमिक्स, सालएस्कोवीटा और ग्रोविट प्लस जैसे जैव-उत्प्रेरकों के लाभ भी बताए जा रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये उत्पाद मिट्टी की गुणवत्ता, जड़ विकास, तनाव सहनशीलता और फसल उत्पादन में सुधार करते हैं।

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प्रधान वैज्ञानिक डॉ. के.के. पाण्डेय ने बताया कि अभियान के दौरान किसानों को जैविक कीटनाशक और फफूंद नियंत्रण तकनीकों की भी जानकारी दी जा रही है। ट्राईकोडर्मा, एक्टिनोगार्ड और बैसिलस सीआरबी-7 जैसे जैव-नियंत्रण एजेंटों के माध्यम से रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग को कम करने पर जोर दिया जा रहा है।

प्रधान प्रसार वैज्ञानिक डॉ. नीरज सिंह ने बताया कि शिविरों में किसानों को जैव-उर्वरकों की गुणवत्ता जांच, सूक्ष्मजीव कल्चर तैयार करने, ड्रिप-फर्टिगेशन तकनीक तथा सब्जी अवशेषों से जैविक खाद बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।

आईआईवीआर के निदेशक डॉ. राजेश कुमार ने किसानों से अपील की कि वे मिट्टी की सेहत को समझें और अत्यधिक रासायनिक उपयोग से बचते हुए जैविक विकल्प अपनाएं। उन्होंने कहा कि जैव-उर्वरकों के नियमित उपयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता बढ़ेगी, उत्पादन लागत घटेगी और रसायन-मुक्त सब्जियों को बाजार में बेहतर कीमत मिलेगी।

Shiv murti

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