घोंसला ऐसा कि देखने वाला रह जाए हैरान, नर बया की कारीगरी पर फिदा होती है मादा
सोनभद्र (जनवार्ता)। पेड़ की डाल से उल्टा लटका घोंसला, घास के महीन रेशों की मजबूत बुनावट और नीचे की ओर खुलता संकरा रास्ता- बया पक्षी का आशियाना पहली नजर में किसी कुशल कारीगर की बनाई कलाकृति से कम नहीं लगता। प्रकृति की इस अनोखी वास्तुकला में सबसे खास भूमिका नर बया की होती है, जबकि मादा घोंसले की मजबूती और बनावट को परखने के बाद ही उसे स्वीकार करती है।


ग्रामीण इलाकों में इन दिनों पेड़ों पर लटकते बया के घोंसले लोगों का ध्यान खींच रहे हैं। ग्रामीण विनय मिश्रा बताते हैं कि वर्षों से गांवों के आसपास इसी तरह अपने घोंसले बनाती आ रही है। उनका कहना है कि नर बया घंटों मेहनत कर तिनके और घास के रेशों को इस तरह बुनता है कि तेज हवा और बारिश में भी घोंसला आसानी से नहीं टूटता।
प्रजनन काल में नर बया सबसे पहले सुरक्षित पेड़ और मजबूत डाल तलाशता है। पानी के आसपास या खुले स्थानों पर मौजूद पेड़ों को वह अक्सर प्राथमिकता देता है। इसके बाद घास, पत्तियों और पौधों के लचीले रेशे जुटाकर चोंच और पैरों की मदद से घोंसले की बुनाई शुरू करता है।
बया का घोंसला सामान्य पक्षियों के घोंसले जैसा नहीं होता। इसका ऊपरी हिस्सा डाल से मजबूती से जुड़ा रहता है, जबकि नीचे की ओर रहने का कक्ष और संकरा प्रवेश मार्ग बनाया जाता है। यह संरचना बारिश और संभावित शिकारियों से बचाव में मदद करती है।
मादा की पसंद पर निर्भर होता है आशियाना-
बताया जाता है कि नर घोंसला तैयार करते समय मादा को आकर्षित करता है। मादा घोंसले का निरीक्षण कर उसकी मजबूती और बनावट परखती है। पसंद आने पर वह नर को स्वीकार कर लेती है, जबकि पसंद न आने पर नर को घोंसला सुधारना या नया घोंसला बनाना पड़ सकता है। इसी वजह से एक ही पेड़ पर कई अधूरे घोंसले भी दिखाई देते हैं।
मादा की स्वीकृति के बाद घोंसले को अंतिम रूप दिया जाता है और उसमें अंडे दिए जाते हैं। मझिगांव गांव ग्रामीण शनि चौबे के मुताबिक, बया का घोंसला केवल खूबसूरती का उदाहरण नहीं, बल्कि प्रकृति की समझदारी और पक्षियों की अद्भुत कारीगरी का जीवंत नमूना है।

