कान्हा की बांसुरी ने मिटाईं मजहबी दीवारें, रसखान से बिस्मिल्लाह तक कृष्ण प्रेम
नई दिल्ली (जनवार्ता)। जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण की भक्ति के उन चेहरों की चर्चा भी होती है, जिन्होंने धर्म और मजहब की सीमाओं से आगे बढ़कर कान्हा को अपना आराध्य बनाया। इनमें कवि रसखान, ताज बीवी और भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जैसे नाम प्रमुख हैं। कृष्ण भक्ति की इस परंपरा में प्रेम और समर्पण इतना गहरा रहा कि भक्तों ने अपनी धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर खुद को कान्हा के चरणों में समर्पित कर दिया।

कृष्ण भक्ति साहित्य में रसखान (सैयद इब्राहिम) का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। मुस्लिम परिवार में जन्मे रसखान कृष्ण प्रेम में ऐसे डूबे कि ब्रज और गोकुल को ही अपना संसार बना लिया। फारसी-उर्दू संस्कारों में पले रसखान ने ब्रजभाषा में कृष्ण भक्ति की ऐसी रचनाएं कीं, जिनमें कान्हा के प्रति निश्छल प्रेम और ब्रजभूमि के प्रति गहरा लगाव दिखाई देता है। यही वजह है कि उन्हें ‘रस की खान’ कहा गया।
रसखान ने अपने प्रसिद्ध सवैये में कृष्ण से जुड़ी रहने की ऐसी इच्छा व्यक्त की, जो आज भी उनकी भक्ति की गहराई को बताती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जन्म मिले तो ब्रज और गोकुल के ग्वालों के बीच रहें, पशु बनें तो नंद बाबा की गायों के बीच चरें और पत्थर बनें तो गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनें। उनकी रचनाओं में कृष्ण के बाल रूप, ब्रज की गलियों और गोप-गोपियों के प्रति गहरा अनुराग देखने को मिलता है।
‘सुजान-रसखान’, ‘प्रेमवाटिका’, ‘दानलीला’ और ‘अष्टयाम’ जैसी रचनाओं के जरिए रसखान ने कृष्ण भक्ति और ब्रजभाषा साहित्य को समृद्ध किया। गोकुल में स्थित उनकी समाधि आज भी उनके कृष्ण प्रेम की याद दिलाती है।
कृष्ण भक्ति की इसी परंपरा में ताज बीवी का नाम भी लिया जाता है। उनकी रचनाओं में श्रीकृष्ण के प्रति गहरा समर्पण दिखाई देता है। वहीं भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खान काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति के बड़े प्रतीक रहे। काशी विश्वनाथ और संकटमोचन मंदिर में शहनाई वादन से उनका गहरा जुड़ाव रहा और कृष्ण भजनों सहित भारतीय आध्यात्मिक संगीत के प्रति उनका विशेष लगाव था।
कृष्ण भक्ति का यह प्रभाव आज भी देश की सीमाओं से बाहर दिखाई देता है। दुनिया के अलग-अलग देशों से लोग कृष्ण भक्ति से जुड़ रहे हैं और इस्कॉन समेत विभिन्न मंदिरों में विदेशी श्रद्धालु भजन, कीर्तन और मंत्र-जप करते नजर आते है।

