प्रेमचंद की ख़ामोश प्रतिमा और हमारी सांस्कृतिक स्मृति
•विजय विनीत

आज हिन्दी-उर्दू के महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। उन्होंने किसान, मज़दूर, दलित, स्त्री और वंचित समाज के संघर्षों को अपनी लेखनी के माध्यम से अमर बना दिया। लेकिन विडंबना यह है कि जिस बनारस की धरती ने उन्हें जन्म दिया, वहीं उनकी स्मृतियां आज उपेक्षा का शिकार हैं।

दुर्दशा की मार झेल रही कथा सम्राट की प्रतिमा।
वाराणसी के पांडेयपुर चौराहे पर फ्लाईओवर के नीचे स्थापित प्रेमचंद की प्रतिमा धूल और गंदगी से ढकी हुई है। बरसात में फ्लाईओवर से रिसकर गिरने वाला पानी प्रतिमा को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है। प्रतिमा की नियमित सफाई और रखरखाव का अभाव साफ दिखाई देता है। इससे भी अधिक विडंबनापूर्ण दृश्य यह है कि प्रतिमा के ऊपर एक निजी विज्ञापन बोर्ड लगा है, जबकि नीचे देश के महान साहित्यकार की प्रतिमा उपेक्षित खड़ी है।

30 जुलाई को वाराणसी में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की गई। चर्चा केवल प्रतिमा की दुर्दशा तक सीमित नहीं रही, बल्कि इस बात पर भी हुई कि साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को हमारी प्राथमिकताओं में अपेक्षित स्थान क्यों नहीं मिल रहा है।
प्रेमचंद केवल कथाकार नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज की संवेदनाओं के सबसे बड़े दस्तावेज़कार थे। उनके पात्र—होरी, धनिया, घीसू, माधव, जुम्मन शेख, अमीना और बूढ़ी काकी—आज भी भारतीय समाज की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। **गोदान**, **गबन**, **रंगभूमि**, **कर्मभूमि**, **सेवासदन** और **प्रेमाश्रम** जैसी कृतियां सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और शोषण के विरुद्ध संघर्ष की अमर धरोहर हैं।
स्थिति केवल पांडेयपुर की प्रतिमा तक सीमित नहीं है। प्रेमचंद के पैतृक गांव लमही में भी उनकी साहित्यिक विरासत के संरक्षण को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि साहित्यकारों की स्मृतियों के संरक्षण के प्रति गंभीर और दीर्घकालिक प्रयासों की आवश्यकता है।
यह केवल एक प्रतिमा के रखरखाव का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना और साहित्यिक विरासत के सम्मान का विषय है। किसी समाज की पहचान केवल उसके विकास कार्यों से नहीं, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह अपने साहित्यकारों, कलाकारों और सांस्कृतिक प्रतीकों को कितना सम्मान देता है।
मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर आवश्यकता केवल माल्यार्पण की नहीं, बल्कि उनकी स्मृतियों और विरासत के संरक्षण के प्रति ठोस संकल्प की है। यदि हम अपने महान रचनाकारों की धरोहर को सुरक्षित नहीं रख पाए, तो आने वाली पीढ़ियां हमें एक ऐसे समाज के रूप में याद करेंगी, जिसने अपने साहित्यिक नायकों को सम्मान देने में गंभीर चूक की।

