सुप्रीम कोर्ट : हरीश राणा को दी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति
भारत में पहला व्यावहारिक मामला
नई दिल्ली (जनवार्ता)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए गाजियाबाद के 32 वर्षीय युवक हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। यह भारत में 2018 के कॉमन कॉज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में स्थापित दिशानिर्देशों को पहली बार किसी व्यक्तिगत केस में लागू करने का महत्वपूर्ण उदाहरण है, जहां कोर्ट ने जीवन रक्षक चिकित्सा उपचार को हटाने की मंजूरी प्रदान की।

हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में पढ़ाई के दौरान हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उन्हें गंभीर सिर की चोट लगी और वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट (Permanent Vegetative State) में चले गए। पिछले 13 वर्षों से वे पूरी तरह बिस्तर पर पड़े हुए हैं, फीडिंग ट्यूब और अन्य लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर हैं। मेडिकल बोर्डों की रिपोर्ट्स, जिसमें एम्स की जांच भी शामिल है, ने स्पष्ट किया कि उनकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नहीं है और वे 100% क्वाड्रिप्लेजिया से पीड़ित हैं।
उनके पिता अशोक राणा और परिवार ने लंबे संघर्ष के बाद आर्थिक व भावनात्मक बोझ सहते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। जनवरी 2026 में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। आज जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने फैसला सुनाया, जिसमें कोर्ट ने इसे ‘राइट टू डाई विद डिग्निटी’ का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया। कोर्ट ने शेक्सपियर के प्रसिद्ध संवाद “To be or not to be” का जिक्र करते हुए गरिमापूर्ण मृत्यु पर जोर दिया और कहा कि हम उसे और पीड़ा में नहीं रख सकते।
फैसले में स्पष्ट किया गया कि एक्टिव यूथेनेशिया (दवा देकर मौत देना) अवैध है, लेकिन पैसिव यूथेनेशिया यानी लाइफ सपोर्ट हटाना परिवार की सहमति और मेडिकल प्रोटोकॉल के तहत अनुमति योग्य है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि हरीश राणा को दिल्ली के एम्स में पैलिएटिव केयर विभाग में भर्ती किया जाए, जहां प्रक्रिया चिकित्सकीय दिशानिर्देशों के अनुसार पूरी की जाएगी। साथ ही केंद्र सरकार को पैसिव यूथेनेशिया पर स्पष्ट कानून बनाने की सिफारिश की गई है।

