प्रयोगशाला में बन रहे असली हीरे, पहचान के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी
■ प्राकृतिक और प्रयोगशाला में तैयार हीरे में आंखों से अंतर करना मुश्किल, विशेष तकनीक से होती है पहचान

( विशेष संवाददाता)
चेन्नई। हीरा अब केवल धरती की गहराई में प्राकृतिक रूप से बनने वाला रत्न नहीं रह गया है। आधुनिक विज्ञान और तकनीक की मदद से प्रयोगशालाओं में भी वास्तविक हीरे तैयार किए जा रहे हैं। प्राकृतिक हीरे बनने में लाखों से अरबों वर्ष लग सकते हैं, जबकि प्रयोगशाला में तैयार हीरा कुछ सप्ताह में बनाया जा सकता है। दोनों में कार्बन की क्रिस्टलीय संरचना और प्रमुख भौतिक गुण लगभग समान होते हैं।
आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर एमेरिटस एवं भौतिक विज्ञानी प्रो. एम. एस. रामचंद्र राव के अनुसार, प्रयोगशाला में तैयार हीरे वास्तविक हीरे होते हैं। इन्हें घनाकार जिरकोनिया या मोइसानाइट जैसे हीरे के विकल्पों से अलग समझना चाहिए। ये विकल्प केवल देखने में हीरे जैसे दिखाई देते हैं, जबकि प्रयोगशाला में तैयार हीरे में हीरे की वास्तविक क्रिस्टलीय संरचना होती है।
प्राकृतिक और प्रयोगशाला में तैयार हीरे को सामान्य तौर पर केवल आंखों से विश्वसनीय रूप से पहचानना संभव नहीं है। इसकी सही पहचान के लिए विशेष वैज्ञानिक उपकरणों, विश्लेषणात्मक तकनीकों और प्रकाश-वर्णक्रमीय जांच का इस्तेमाल किया जाता है। जीआईए, आईजीआई तथा आईआईटी मद्रास स्थित इनसेंट-एलजीडी जैसी विशेषज्ञ रत्न परीक्षण प्रयोगशालाएं यह निर्धारित कर सकती हैं कि कोई हीरा प्राकृतिक है अथवा रासायनिक वाष्प निक्षेपण या उच्च दबाव-उच्च तापमान तकनीक से तैयार किया गया है।
प्रयोगशाला में तैयार हीरे मुख्य रूप से दो विधियों से बनाए जाते हैं। पहली रासायनिक वाष्प निक्षेपण विधि और दूसरी उच्च दबाव-उच्च तापमान विधि है। रासायनिक वाष्प निक्षेपण विधि से तैयार हीरों का बाद में उच्च दबाव-उच्च तापमान या अन्य प्रक्रियाओं से उपचार भी किया जा सकता है, जिससे उनके रंग और कुछ गुणों में बदलाव लाया जाता है।
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