एक ही छत के नीचे फीस, जांच और दवा का कारोबार!

एक ही छत के नीचे फीस, जांच और दवा का कारोबार!

वरुणापार में डॉक्टरों की क्लीनिक में पैथोलॉजी और मिनी मेडिकल स्टोर चलने के आरोप, मरीजों की जेब पर पड़ रहा कथित दोहरा बोझ

वाराणसी। वरुणापार क्षेत्र में इलाज के नाम पर मरीजों से वसूली के एक नए तरीके को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कुछ निजी क्लीनिकों में डॉक्टर की फीस देने के बाद मरीज को जांच के लिए उसी क्लीनिक परिसर में संचालित पैथोलॉजी और दवा के लिए वहीं मौजूद मेडिकल स्टोर की ओर भेज दिया जाता है। यानी डॉक्टर की फीस, जांच का खर्च और दवाओं की खरीद—तीनों का भुगतान एक ही छत के नीचे करने की मजबूरी मरीज के सामने खड़ी हो जाती है।

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सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस जांच और दवा की जरूरत डॉक्टर के पर्चे पर लिखी जाती है, उसे मरीज अपनी इच्छा से कहीं और करा या खरीद सकता है या नहीं? यदि मरीज को बाहर जांच कराने अथवा दूसरी दुकान से दवा खरीदने की स्वतंत्रता है तो उसे इस बारे में स्पष्ट जानकारी क्यों नहीं दी जाती? वहीं, यदि क्लीनिक परिसर में ही पैथोलॉजी और मेडिकल स्टोर संचालित हो रहे हैं तो उनके लाइसेंस, पंजीकरण, संचालन की शर्तों और डॉक्टर से उनके व्यावसायिक संबंधों की जांच कौन कर रहा है?

मरीजों का आरोप है कि कई बार बाहर के मेडिकल स्टोरों पर मिलने वाली छूट क्लीनिक के भीतर संचालित दुकानों पर नहीं कर मिलती। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इलाज कराने आया मरीज डॉक्टर की लिखी दवा उसी दुकान से खरीदने के लिए बाध्य है?

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सरकारी अस्पताल में मुफ्त जांच, निजी क्लीनिक में हजारों का खर्च?

एक और गंभीर सवाल जांच व्यवस्था को लेकर है। जिन सामान्य जांचों की सुविधा सरकारी अस्पतालों में निःशुल्क अथवा कम शुल्क पर उपलब्ध होने का दावा किया जाता है, उन्हीं जांचों के लिए निजी क्लीनिकों में मरीजों से बड़ी रकम वसूले जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। आरोप है कि कुछ पैथोलॉजी केंद्रों पर पर्याप्त प्रशिक्षित कर्मियों की मौजूदगी और जांच की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल हैं।

यदि किसी क्लीनिक में पैथोलॉजी संचालित हो रही है तो क्या स्वास्थ्य विभाग ने उसका पंजीकरण, मशीनों की स्थिति, तकनीकी कर्मचारियों की योग्यता, गुणवत्ता मानक और जांच रिपोर्ट जारी करने की व्यवस्था की जांच की है? यदि जांच की गई है तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता?

जिस दवा की बाजार में कमी, क्लीनिक के स्टोर में कैसे उपलब्ध?

मरीजों के बीच यह सवाल भी चर्चा में है कि बाजार में किसी-किसी दवा के आसानी से उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में वही दवा कुछ क्लीनिकों के भीतर संचालित मेडिकल स्टोर पर कैसे उपलब्ध हो जाती है। यह महज संयोग है या इसके पीछे आपूर्ति और खरीद की कोई विशेष व्यवस्था है—इसकी जांच की जरूरत है।

डॉक्टर की कमाई या मरीज की मजबूरी?

एक ही परिसर में डॉक्टर की फीस, पैथोलॉजी और मेडिकल स्टोर संचालित होने की व्यवस्था मरीज के लिए सुविधा है या व्यावसायिक मॉडल—यह स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट करना चाहिए। अगर मरीज को डॉक्टर से परामर्श के बाद जांच और दवा खरीदने के लिए उसी परिसर में जाने का दबाव महसूस होता है तो यह व्यवस्था पारदर्शिता और मरीज की स्वतंत्र पसंद के सवाल खड़े करती है।

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इलाज के बढ़ते खर्च से परेशान मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए बीमारी पहले ही आर्थिक संकट बन चुकी है। ऐसे में यदि जांच और दवा के नाम पर अनावश्यक खर्च बढ़ रहा है तो कई परिवारों को जमीन-जायदाद तक बेचने की नौबत आने का दावा किया जा रहा है। इन दावों की स्वतंत्र जांच जरूरी है।

स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी भी सवालों के घेरे में

सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से है—क्या वरुणापार क्षेत्र के ऐसे सभी क्लीनिकों का निरीक्षण हुआ है, जहां डॉक्टर की क्लीनिक के भीतर पैथोलॉजी और मेडिकल स्टोर संचालित हो रहे हैं? क्या सभी के पास वैध लाइसेंस और निर्धारित मानकों के अनुरूप व्यवस्था है? क्या डॉक्टर और मेडिकल स्टोर/पैथोलॉजी के बीच किसी वित्तीय हित-संबंध की जांच की गई है?

यदि सब कुछ नियमों के अनुसार है तो विभाग को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि नियमों का उल्लंघन हो रहा है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

मरीजों का इलाज उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर कारोबार का माध्यम न बने, इसके लिए स्वास्थ्य विभाग को क्लीनिक, पैथोलॉजी और मेडिकल स्टोर की संयुक्त जांच कराकर रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए। वरना अधिकारियों की चुप्पी पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मरीजों की जेब पर पड़ रहे इस कथित बोझ को रोकने की जिम्मेदारी किसकी है?

Shiv murti

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