भगवान जगन्नाथ को लगा काढ़े का भोग
प्रसाद लेने के लिए उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़
वाराणसी (जनवार्ता) । जेठ पूर्णिमा पर आयोजित स्नान यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के प्रतीकात्मक रूप से अस्वस्थ होने की परंपरा के तहत मंगलवार से तीनों देव 14 दिनों के एकांतवास में चले गए। इसी क्रम में शाम चार बजे भगवान को विशेष औषधीय काढ़े का भोग अर्पित किया गया।


मंदिर के प्रधान पुजारी राधेश्याम पांडे ने काली मिर्च, लौंग, छोटी एवं बड़ी इलायची, जायफल, खांडसारी और तुलसी से तैयार पारंपरिक औषधीय काढ़ा मिट्टी के चूल्हे पर स्वयं बनाकर भगवान को अर्पित किया। धार्मिक मान्यता है कि यह काढ़ा भगवान के स्वास्थ्य लाभ का प्रतीक माना जाता है।

मंदिर के मीडिया प्रभारी ने बताया कि भगवान को काढ़े का भोग लगाए जाने के बाद औषधीय प्रसाद ग्रहण करने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। उन्होंने कहा कि लोकमान्यता के अनुसार इस औषधीय प्रसाद के सेवन से सर्दी, खांसी और पेट संबंधी कई समस्याओं में लाभ मिलता है।
उन्होंने बताया कि भगवान जगन्नाथ की स्नान यात्रा, गणेश स्वरूप दर्शन, एकांतवास और औषधीय काढ़े की परंपरा काशी की समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और लोकविश्वास का जीवंत प्रतीक है, जिसे श्रद्धालु पीढ़ियों से पूरी श्रद्धा के साथ निभाते आ रहे हैं। भगवान का एकांतवास यह संदेश भी देता है कि सनातन परंपराओं में आध्यात्मिक भाव के साथ लोकजीवन और स्वास्थ्य से जुड़े प्रतीकों का भी विशेष महत्व है।

