बंगाल में बदलती हवा! 5 ‘M’ फैक्टर से चुनावी रण में टीएमसी पर भारी पड़ती दिखी भाजपा
कोलकाता (जनवार्ता)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना के बीच राज्य की राजनीति में बड़ा उलटफेर होता नजर आ रहा है। शुरुआती रुझानों में भाजपा ने बढ़त बनाकर मुकाबले को बेहद रोचक कर दिया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सत्ता बचाने के लिए संघर्ष करती दिख रही है। 293 सीटों पर जारी मतगणना के बीच राजनीतिक विश्लेषकों की नजर उन पांच बड़े ‘M’ फैक्टर्स पर टिकी है, जिन्होंने इस चुनाव का पूरा समीकरण बदल दिया।
रुझानों के अनुसार भाजपा करीब 185 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि टीएमसी लगभग 100 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है। वोट शेयर में भी भाजपा को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है। हालांकि अंतिम परिणाम अभी आना बाकी है, लेकिन मौजूदा संकेत बंगाल की राजनीति में संभावित बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं।
सबसे चर्चित भवानीपुर सीट पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बढ़त बनाए हुए हैं, जबकि भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी पीछे चल रहे हैं। वहीं झाड़ग्राम क्षेत्र की कई सीटों पर भाजपा की मजबूत स्थिति ने जनजातीय इलाकों में पार्टी की बढ़ती पकड़ को स्पष्ट किया है।
बंगाल की लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी लंबे समय से चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती रही है। परंपरागत रूप से यह वोट बैंक टीएमसी के पक्ष में माना जाता रहा, लेकिन इस बार हालात कुछ अलग नजर आए। कुछ क्षेत्रों में नए राजनीतिक दलों की सक्रियता और भाजपा के आक्रामक प्रचार अभियान ने मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को प्रभावित किया। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में इसका असर देखने को मिला।
महिला मतदाताओं ने इस चुनाव में अहम भूमिका निभाई। राज्य सरकार की लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं ने टीएमसी को महिला वर्ग में समर्थन दिलाया, वहीं भाजपा ने महिला सुरक्षा, संदेशखाली और आरजी कर अस्पताल जैसे मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया। इसका असर यह रहा कि महिला वोट पूरी तरह किसी एक दल के पक्ष में नहीं गया और कई सीटों पर मुकाबला कांटे का बन गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार रैलियों और रोड शो ने भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाया। खासकर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में भाजपा ने आक्रामक प्रचार के जरिए अपनी मौजूदगी मजबूत की। झाड़ग्राम क्षेत्र में पार्टी की बढ़त को इसी रणनीति का परिणाम माना जा रहा है।
भाजपा ने बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय रखते हुए माइक्रो मैनेजमेंट पर जोर दिया। वहीं टीएमसी ने अपने पारंपरिक नेटवर्क और स्थानीय नेतृत्व के सहारे चुनावी मुकाबले को संभालने की कोशिश की। कई सीटों पर संगठनात्मक मजबूती निर्णायक साबित होती दिख रही है।
बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और विकास जैसे मुद्दों पर युवा और मध्यम वर्ग के मतदाताओं में नाराजगी देखी गई। भाजपा ने इन वर्गों को साधने के लिए बदलाव और रोजगार का मुद्दा उठाया, जबकि टीएमसी ने कल्याणकारी योजनाओं पर भरोसा जताया। इन वर्गों का झुकाव कई शहरी सीटों पर असर डालता दिखाई दिया।
राज्य की राजनीति में अब सबकी नजर अंतिम नतीजों पर है। यदि शुरुआती रुझान परिणामों में बदलते हैं, तो पश्चिम बंगाल में लंबे समय बाद सत्ता का बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है।


